जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

मैं गाँव हूँ

जबलपुर दर्पण/पाटन संवाददाता । मैं गाँव हूँ , मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर ये आरोप है कि यहाँ रहोगे तो भूखे मर जाओगे। मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप है कि यहाँ अशिक्षा रहती है।
मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर असभ्यता और जाहिल गवाँर का भी आरोप है।
हाँ मैं वहीं गाँव हूँ जिस पर आरोप लगाकर मेरे ही बच्चे मुझे छोड़ कर दूर बड़े बड़े शहरों में काम धंधे की तलास मे चले जाते है। जब मेरे बच्चे मुझे छोड़कर जाते हैं तब मैं रात भर सिसक सिसक कर रोता हूँ फिर भी मरा नही हूँ मे, मन में एक आश लिए आज भी गाँव की तरफ निहारता रहता हूं शायद मेरे बच्चे आ जायँ,देखने की ललक में सोता भी नहीं हूँ।
लेकिन जो जहाँ गया वहीं का हो गया। मैं पूछना चाहता हूँ अपने उन सभी बच्चों से क्या मेरी इस दुर्दशा के जिम्मेदार तुम नहीं हो ? अरे मैंने तो तुम्हे कमाने के लिए शहर भेजा था और तुम मुझे छोड़कर शहर के ही हो गए। क्या तुम्हारी कमाई से मुझे घर,मकान,बड़ा स्कूल, कालेज,इन्स्टीट्यूट,अस्पताल,आदि बनाने का अधिकार नहीं है। ये अधिकार मात्र शहर को ही क्यों है । जब सारी कमाई शहर में दे रहे हो तो मैं कहाँ जाऊँ मुझे मेरा हक क्यों नहीं मिलता।
इस कोरोना संकट में सारे मजदूर गाँव भाग रहे हैं।गाड़ी नहीं तो सैकड़ों मील पैदल बीबी बच्चों के साथ चल दिये आखिर क्यों ,जो लोग यह कहकर मुझे छोड़कर शहर चले गए थे कि गाँव में रहेंगे तो भूख से मर जाएंगे,वो किस आशा और विस्वास से पैदल ही गाँव लौटने लगे, मुझे तो लगता है निश्चित रूप से उन्हें ये विस्वास है कि गाँव पहुँच जाएंगे तो जिन्दगी बच जाएगी,भर पेट भोजन मिल जाएगा, परिवार बच जाएगा।सच तो यही है कि गाँव कभी किसी को भूख से नहीं मारता । आओ मुझे फिर से सजाओ,मेरी गोद में फिर से चौपाल लगाओ,मेरे आंगन में चाक के पहिए घुमाओ,मेरे खेतों में अनाज उगाओ,खलिहानों में बैठकर आल्हा खाओ,खुद भी खाओ दुनिया को भी खिलाओ,महुआ ,पलास के पत्तों को बीनकर पत्तल बनाओ,गोपाल बनो,मेरे नदी ताल तलैया,बाग,बगीचे  गुलजार करो, बड़े बुजुर्गो की दांती पीस पीस कर प्यार भरी गालियाँ, चाची चाचा ताई और दादी की अपनापन वाली खीज और पिटाई, रामबाबू हलवाई की मिठाई भड़भूजे की सोंधी महक,चना बथुआ का रायता बाजरा की रोटी दही छाच और गुड शक्कर ये सब आज भी तुम्हे पुकार रहे है। मैं तनाव भी कम करने का कारगर उपाय हूँ।मैं प्रकृति के गोद में जीने का प्रबन्ध कर सकता हूँ।मैं सब कुछ कर सकता हूँ । बस तू समय समय पर आ जाया करो मेरे पास,अपने बच्चों को मेरी गोद में डाल कर निश्चिंत हो जाओ,दुनिया की कृत्रिमता को त्याग दें।फ्रीज का नहीं घड़े का पानी पियो त्यौहारों समारोहों में पत्तलों में खाने और कुल्हड़ों में पीने की आदत डालो,अपने मोची के जूते,और दर्जी के सिले कपड़े पर इतराने की आदत डालो,हलवाई की मिठाई,खेतों की हरी सब्जियाँ,फल फूल,गाय का दूध ,बैलों की खेती पर विस्वास रख कभी संकट में नहीं पड़ोगे।हमेशा खुशहाल जिन्दगी चाहते हो तो मेरे लाल मेरी गोद में आकर कुछ दिन खेल लिया कर तू भी खुश और मैं भी खुश।अपने गाँव की याद मेंl

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