“कुछ बहका है…”

तेरे दुनिया में आकर जिंदगी ,
कुछ जी लिए कुछ बहका है ।
ये महफिल में जाम ए बेखुदी ,
कुछ पी लिए कुछ छलका है ।
उघेड़ते भी रहे हम बंदगी !
बुनते भी रहे हम जिंदगी !!
उधेड़बुन के बीच ये खामोशी ,
कुछ सी लिए कुछ उघेड़ा है ।
जमाने निगाहों की पहरेदारी !
कैद हुआ जिंदगी चार दिवारी !!
अपने ही घर में मेहमां सरपरस्ती ,
कुछ बीत गए दिन कुछ ठहरा है ।
दिल दरिया इश्क समंदर !
यह नैन तेरे इश्क समंदर !!
इन नैनो के अश्क़ सूखते नहीं ,
कुछ पी लिए कुछ छलका है ।
इन तमाम शहरों में पाबंदी है !
फिर भी मिलने को रजामंदी है !!
जिद है उनकी मिलना है जरूरी ,
कुछ मिल गए कुछ बिछड़ा है ।
याद भी क्या ज़ालिम बला है !
सदियों से हमारा सिलसिला है !!
मज़ार पर आकर दो फूल चढ़ा गए ,
कुछ पिरो लिए कुछ यूं ही बिखरा है ।
तेरे दुनिया में आकर जिंदगी ,
कुछ जी लिए कुछ बहका है ।
ये महफिल में जाम ए बेखुदी ,
कुछ पी लिए कुछ छलका है ।।
स्वरचित एवं मौलिक
मनोज शाह ‘मानस’
सुदर्शन पार्क
नई दिल्ली-110015



