काश नई संसद में माननीय भी होते हाईटेक!
नए संसद भवन के निर्माण की रफ्तार, माननीयों की संख्या और जनसंख्या का मौजूदा अनुपात जबरदस्त चर्चाओं में है। माना जा रहा है कि निर्माणाधीन संसद के आकार, प्रकार को देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि नए तरीके से संसदीय सीटों के परिसीमन की प्रक्रिया तो होनी ही है, कब होगी इस पर संदेह है। कई तकनीकी सवाल भी उठ रहे हैं और व्यव्हारिक कठिनाइयां भी गिनाई जा रही हैं। सांसदों की संख्या कितनी होनी चाहिए। इसके लिए तमाम नियम, सीमाएं, जनसंख्या के अनुपात का गुणनफल भी है। लेकिन उससे भी बड़े व्यव्हारिक उदाहरण कई मौजूदा संसदीय क्षेत्र हैं। अभी वर्तमान आबादी के लिहाज से औसतन एक सांसद पर लगभग 24 लाख 87 हजार के लोगों के प्रतिनिधित्व के दायित्व है। व्यव्हारिक तौर पर अभी देश में कई ऐसे जिले हैं जिनमें वहां एक सांसद 16 लाख से 20-22 लाख और कहीं-कहीं 30 लाख से ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जाहिर है यह संख्या बहुत बड़ी है और एक सांसद का इतने लोगों या बड़े क्षेत्र के संपर्क में रह पाना मुश्किलों भरा है। जहां तक संसदीय क्षेत्र के विकास की बात तो वह भी ऐसी परिस्थितियों में काफी पेचीदगियों से भरी होती है। निश्चित रूप से लोकसभा का भौगोलिक क्षेत्रफल भी कई जगह व्यव्हारिक रूप से काफी विसंगति पूर्ण है। कहीं एक सांसद का संसदीय क्षेत्र 2-3 जिलों तक फैला हुआ होता है तो कहीं अलग-अलग संभागों का क्षेत्र भी आ जाता है। जाहिर है सांसद के सामने कई तरह की तकनीकी, व्यव्हारिक असमंजस भरी कठिनाइयां होना स्वाभाविक है जो आती भी हैं।
नियमानुसार निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का परिसीमन आयोग करता है। संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार हरेक जनगणना के बाद केन्द्र सरकार परिसीमन आयोग का गठन करती है जो संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का सीमांकन करता है। आखिरी परिसीमन 2002 के प्रावधानों के तहत वर्ष 2001 की जनगणना आंकड़ों के आधार पर हुआ जो 2008 में खत्म हुआ। इसमें देश में जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रयासों के चलते तय किया गया था कि 2026 तक लोकसभा की सीटें नहीं बढ़ाई जाएंगी। मकसद जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रयासों को प्रभावित नहीं होने देना और राज्यों के प्रतिनिधित्व के बीच मौजूदा संतुलन कायम रखना था। यदि तब पूर्व की परंपरा को जारी रखते हुए जनसंख्या को लोकसभा सीटों का आधार बनाया जाता तो उन उत्तरी राज्यों की सीटों में भारी इजाफा हो जाता जहां जनसंख्या स्थिरीकरण कार्यक्रम असफल रहा है। यही सब देखकर लगता है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत नया परिसीमन भी 2031 की जनगणना के बाद ही हो पाएगा?
दरअसल संविधान में संशोधनों के जरिए आबादी के लिहाज से यदि सीटों को स्थिर नहीं किया जाता तो अब तक संसदीय क्षेत्रों की भौगोलिक स्थितियां काफी बदली हुई होतीं। बड़े प्रदेशों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली सरीखे राज्यों में लोकसभा सीटें बढ़ गईं होतीं तो वहीं छोटे प्रदेशों जैसे तमिनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना एवं जहां आबादी पर नियंत्रण है वहां सीटों के घटने का नुकसान उठाना पड़ता। लेकिन आपातकाल के दरम्यान 1976 में संविधान में 42वां संशोधन कर 1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक विधानसभाओं और लोकसभा की सीटों की संख्या को बढ़ने से रोक कर स्थिर कर दिया गया। उधर, 2001 में हुए 84वें संविधान संशोधन में लोकसभा और विधानसभा की सीटों में भी वर्ष 2026 तक जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रयासों के चलते कोई परिवर्तन न करने का प्रावधान किया गया।
इधर देश की जनसंख्या 135 करोड़ को पार करने की बातें हो रही हैं। उधर आबादी के हिसाब से सीटों को जस का तस रखने से कई राज्यों में बड़े पैमाने पर विसंगतियां भी दिखने लगीं। 1971 की जनगणना के हिसाब से हर बड़े राज्य में लगभग 10 लाख की आबादी पर एक सांसद थे। लेकिन अब सीटों की संख्या तो वही है जबकि जनसंख्या तेजी से बढ़ गई है। ऐसे में राजस्थान जैसे बड़े राज्य में कुछ संसदीय सीटों की आबादी 30 लाख पार कर चुकी है वहीं केरल या तमिलनाडु में सिर्फ 18 लाख की आबादी पर एक सांसद हैं। जाहिर है यह असंतुलन भी विकास में बड़ी बाधा है। इधर 2026 में नए तरीकों से परिसीमन को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। इसके पीछे बड़ा तर्क सेण्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत बनाई जा रही संसद की नई इमारत है जो राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट के बीच 60 हजार स्क्वायर मीटर में त्रिकोणीय आकार में बन रही है। नई संसद में 1350 सांसद बैठ सकेंगे। राज्यसभा की नई इमारत में 400 सीटे होंगी। यह संसद भविष्य के परिसीमनों की जरूरतों को लंबे समय तक पूरा करेगी। इसमें 120 दफ्तर होंगे। सांसदों, उप-राष्ट्रपति, स्पीकर समेत विशिष्ट अतिथियों के लिए छह अलग-अलग दरवाजे भी होंगे।
अब यदि 2019 के ही आम चुनाव को आधार मान लिया जाए और 10 लाख की आबादी पर एक सांसद का फॉर्मूला लगाया जाए तो देश के 88 करोड़ वोटरों के लिए 888 सांसद होने चाहिए। दरअसल परिसीमन का मतलब ही है कि लोकसभा और विधानसभाओं की सीमाओं को फिर से सीमांकित किया जाए ताकि आबादी में होने वाले बदलावों को सही तरीके से प्रतिनिधित्व मिल सके। हालांकि जहां 60 लाख से कम आबादी वाले छोटे राज्यों को इस नियम से छूट दी जाती है वहीं हर केंद्र शासित प्रदेशों खातिर कम से कम एक सीट आवंटित है भले ही उसकी जनसंख्या कितनी भी हो जैसे लक्षद्वीप की आबादी एक लाख से कम है लेकिन वहां से एक लोकसभा सांसद है।
इतनी विसंगतियों के बीच 2026 या 2031 जब भी परिसीमन होगा बहुत ही पेचीदा होगा। जाहिर है प्रदेश की सीमाओं, संभाग व जिलों की सीमाओं संसदीय क्षेत्र के क्षेत्रफल के लिहाज से काफी कुछ बदलने की लंबी कवायद होगी। क्षेत्रीय संतुलन, क्षेत्र का विकास और वह संख्या जिसका सांसद करेंगे सारा कुछ काफी मायने रखेंगे। हां, यह भी ध्यान रखना होगा जब नई संसद अस्तित्व में आ जाएगी तब तकनीकी उड़ान में भी भारत 5 जी या उससे आगे पहुंच चुका होगा। ऐसे में अपने क्षेत्र के विकास और जनसमस्याओं के निराकरण के लिए दौरों के बजाए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सांसदों की हर जगह डिजिटल मौजूदगी और संसदीय क्षेत्र के हर आम व खास से खुले मंच पर सार्वजनिक संवाद की भी कोई न कोई शुरुआत हो चुकी होगी। तब आज जैसे बड़ा क्षेत्रफल या सभी से संपर्क न हो पाने जैसी बातें पुरानी हो जाएंगी। प्रतिनिधित्व में आबादी का अनुपात जरूर घटेगा लेकिन जिम्मेदारियों, क्षेत्रवासियों से डिजिटलाइज संपर्क व संवाद जैसी भागीदारी बढ़ेगी और इस दायित्व को जो भी माननीय कुशलता से निभा पाएंगे वही उस दौर में सच्चे जनप्रतिनिधि कहलाएंगे। कुल मिलाकर नई संसद में माननीयों की भी डिजिटल मोड में नई अग्निपरीक्षा से इंकार नहीं किया जा सकता है। बस इंतजार है उसी दिन का जब हर एक मतदाता सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कभी भी और कहीं भी अपने जनप्रतिनिधि से अपनी जायज समस्याओं के लिए संवाद कर सके और उनके माननीय यह न कह सकें समय की कमीं या दौरे में दिक्कत के चलते संसदीय क्षेत्र का विकास बाधित हुआ। काश, नई संसद में सर्व व्यापी, सर्व सुलभ हाईटेक माननीय अपनी वो भूमिका जल्द निभाते जो वक्त का तकाजा है। यकीनन भारत जैसे विशाल जनसंख्या व क्षेत्रफल वाले देश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।



