रावण को जलाने से पहले अपने अंदर की बुराइयों को जलाना चाहिए

विजयादशमी विशेष, आलेख ✍🏻 आशीष जैन (जबलपुर दर्पण)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।
संत कबीर दास कहते हैं, जब मैंने इस संसार में बुरे लोगो को खोजा, तो मुझे कोई भी बुरा आदमी नहीं मिला। परन्तु जब अपने अंदर झाँका अपनी अंतरात्मा में खोजा तो मुझसे बुरा कोई इस संसार में नही मिला। हर व्यक्ति के अंदर बुराइयां होती हैं पर, उस व्यक्ति को अपने अंदर की बुराइयां नजर नहीं आती। हमेशा दूसरों की कमियाँ, गलतियां और बुराइयां ही दिखती हैं। एक कटु सत्य यही है कि कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता। लोग दूसरों की कमियों और बुराइयों की चर्चा बड़े मजेदार अंदाज में करते हैं और मजा लेते है, जबकि हकीकत कुछ अलग ही होती है। अगर व्यक्ति आपको अच्छा लगता है तो उसकी कमियां नहीं देखता, सिर्फ अच्छाइयां देखता है। और व्यक्ति अगर आपको अच्छा नहीं लगता तो उसकी अच्छाइयां भी बुराइयां उसके नजर में परिवर्तित जाती है। यह नजर और नजरिया का ही फर्क हकीकत बयां करता।
रावण वैसे तो बहुत गुणी था, लेकिन उसमें कुछ बुराइयां भी थीं। रावण की बुराइयां ही उसकी अच्छाइयों पर भारी पड़ गई और उसके जीवन का अंत बहुत ही बुरी तरह से हुआ। रावण की बुराइयों के कारण ही उसके सभी पुत्र, भाई और कुल का नाश हो गया। रावण की एक बुराई यह थी कि वह सुंदर स्त्रियों को देखते ही मोहित हो जाता था। महाज्ञानी शिव भक्त रावण को हर वर्ष विजयादशमी के दिन जलाया जाता है परंतु रावण भी सोचता एवं कहता होगा “मुझे जलाने से पहले अपने अंदर की बुराइयों को जलाओ” मैंने एक बार गलती की उसकी सजा हर वर्ष विजयादशमी के दिन भुगतता आ रहा हूँ। परंतु तुम भी कभी भी ऐसी गलती मत करना। सभी को विजयादशमी की अनंत शुभकामनाएँ।



