चार दिन के चुनाव, कराते हैं आपसी संबंध खराब

आलेख : आशीष जैन {उप संपादक} दैनिक जबलपुर दर्पण

चुनाव आते हैं और चले जाते। आजादी के बाद से जनता को लगभग हर पांच वर्ष में मतदान का अवसर अवश्य प्राप्त होता है। चुनाव चाहे लोकसभा, विधानसभा या पंचायत के हो, एक पद के बहुत से दावेदार होते ही हैं। चुनावों मैं खड़े होने वाला प्रत्याशी चाहे दलीय हो या निर्दलीय उसके समर्थको को राजनीति के चक्कर में आपसी संबंधों को खराब नही करना चाहिए। वह व्यक्ति आपके आसपास के क्षेत्र का या मोहल्ले का ही होता है वह अपनी विचारधारा के अनुसार राजनीतिक दल या निर्दलीय प्रत्याशी का समर्थन करता है। मतभेद हो सकते हैं पर मन भेद नहीं होना चाहिए। चार दिन के चुनावों में अगर आपसी संबंध खराब हो जाएंगे तो वह लंबे समय तक चलेते जाते हैं और कोई बड़ी घटना-दुर्घटना को अंजाम दे सकते हैं।
आमतौर पर देखा गया है किसी भी राजनीतिक दल के बड़े नेता चुनावी सभा, रैली और मंच आदि को छोड़ दें तो वह जब व्यक्तिगत वैचारिक मुलाकात करते हैं तो वह आपसी व्यवहार बोलचाल से एक मित्र की तरह व्यवहार करते हैं न कि प्रतिद्वंद्वी या विरोधी के रूप में। वे सब साथ उठते बैठते खाते पीते समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में नजर आते हैं। क्या छोटे, मझोले और जमीनी कार्यकर्ताओं को इन बड़े नेताओं से सीखना नहीं चाहिए कि जब आप की पार्टी के सर्वोच्च या द्वितीय पंक्ति के नेता जब अन्य पार्टी के नेताओं से इस तरह मुलाकात या मित्र जैसा व्यवहार करते हैं तो आप क्यों मतभेद को मनभेद में परिवर्तित करते हैं। आप आपने ही मोहल्ले के विपक्षी राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं या समर्थक के साथ मनमुटाव और संबंधों को चुनावों और राजनीति के चक्कर में खराब कर बैठते हैं।
हर चुनाव में निर्धारित पदों के लिए विभिन्न प्रत्याशी अपने भाग्य को अजमा कर जनता के सामने उपस्थित होते हैं। आमजन जो किसी भी राजनीतिक पार्टी से संबंधित नहीं होता, वह अपने स्वविवेक से अपने नेता का चयन करता है और बहुमत के आधार पर वह निर्वाचित होकर विजयश्री प्राप्त करता है। अपने नेता के लिए आप, अपने ही जैसे कार्यकर्ता से मनमुटाव या बुराई करते हैं तो इसमें फायदा कम और नुकसान ज्यादा है। आप उस राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के तौर पर आमजन से अपने प्रत्याशी को मतदान करने का आग्रह करते हैं यह कोई जोर जबरदस्ती का मामला नहीं होता।
तब फिर छोटी-छोटी बातों को लेकर प्रतिद्वंदिता में यकायक ही बड़ी घटनाएं घटित हो जाती हैं जिसका दुष्परिणाम वर्षों की बुराई और कटुता का कारण बनती है। चुनावों को एक उत्सव के रूप में लेते हुए समस्त राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को यह विचार करना चाहिए कि चार दिन के चुनावों में अपने ही क्षेत्र के व्यक्ति या मतदाताओं से किसी भी प्रकार से संबंध खराब ना हो और चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो जाए संपन्न हो जाए।
चुनावों में आपसी व्यवहार और संबंध खराब होने के मुख्य कारण पार्टीवाद की कट्टरता, जातिवाद, धनबल ओर बाहुबल हो सकते हैं जिसके चलते घटनाएं, यकायक अनावश्यक रूप से घटित हो जाती हैं और वह दुख का कारण बनती।
इस संबंध में जब राजनीतिक दल से जुड़े नेताओं से चर्चा की गई तब उन्होंने इस बात को प्रमाणित किया कि धरातल पर यह चीजें देखने में जरूर मिलती हैं। हर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं से यही अपील और निर्देशन देता है कि चुनावों में किसी भी तरह से विरोधी दल या मतदाताओं के साथ कोई अनैतिक और असंवैधानिक घटना घटित नही होनी चाहिए। चुनाव शांतिपूर्ण व सुरक्षित तरीके से आमजन के सामने, आमजन के लिए लड़ा जा रहा है। चुनावों में हार और जीत का निर्णय आम मतदाता वोट डालकर करता है। बहुमत के आधार पर कोई एक व्यक्ति ही चुना जाता है जोकि उस क्षेत्र का निर्वाचित प्रत्याशी सभी के लिए नेता होता है।



