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धान के भुगतान के लिए परेशान हो रहे हैं किसान

जबलपुर। क्या सरकारी मशीनरी किसानों को छल रही है? क्या किसानों के साथ धोखा हो रहा है? क्या किसानों से पैसे ऐंठने के नए नए तरीके ईजाद हो गए? यह सारे सवाल हम नहीं खड़े कर रहे हैं बल्कि यह सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं किसानों के मन में। क्योंकि जब किसानों का अनाज खरीद केंद्रों पर जाता है तब तौल के पहले सभी खरीद केंद्रों पर विपणन संघ के द्वारा नियुक्त 1 ग्रेडर जाकर किसानों की उपज की जांच करता है। यदि विपणन संघ द्वारा तय मानकों पर किसान की उपज खरी नहीं उतरती तो उसे फेल कर दिया जाता है। जब तक ग्रेडर उस उपज को पास नहीं करता तब तक खरीद केंद्र में उस किसान की उपज की खरीद नहीं होती। कहने का आशय यह है कि जब विपणन संघ किसान की उपज की अच्छी गुणवत्ता के प्रति आश्वस्त हो जाता है तभी वह उसे समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है। किसानों की ऊपज खरीदी गई और किसान को पर्ची मिल गई उसके बाद किसान को उसकी उपज का मूल्य मिल जाना चाहिए। परंतु यह एक अद्भुत खेल है जिसे समझना आवश्यक है कि किसान धान की खरीद के पैसों के लिए अब तक भटक रहे हैं। एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। एक किसान अपनी उपज के मूल्य पर ही आश्रित होता है। उसी पर उसका परिवार चलता है घर चलता है। उसकी जरूरतें उसी उपज के मूल्य पर पूरी होती हैं। लेकिन वाह री सरकार, किसानों की हितैषी होने का दम भरने वाली सरकार, आज किसानों को परेशान कर रही है। मध्यप्रदेश शासन द्वारा 20 जनवरी 2020 तक धान की खरीद की अंतिम तारीख तय की थी जिसमें जबलपुर के जिले के 16 सौ से अधिक किसानों का भुगतान आज तक प्राप्त नहीं हुआ है। किसानों के खाते में पैसा डाल दिया गया है लेकिन खातों को होल्ड कर दिया गया है। और किसानों को धान खरीद की पावती दे दी गई थी उसके बाद पोर्टल में चर्बी गई थी। इसके बाद यदि खरीद केंद्र पर रखे रखे पानी के गिरने के कारण धान की गुणवत्ता खराब हुई तो क्या इसका जवाबदार किसान है? पौडा़ के किसान जब इस सवाल का जवाब पाने कलेक्ट्रेट ऑफिस पहुंचे तो वह घंटों भटकते रहे।किसानों के पास मध्यप्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित के द्वारा जारी किए गए एक आदेश की प्रति थी जिसमें एनआईसी भोपाल द्वारा यह बात टंकित की गई थी कि जबलपुर जिले में 1642 ट्रांजैक्शन और 1613 किसानों के बैंक खातों में तकनीकी कारणों से धान उपार्जन की राशि के विरुद्ध भुगतान की राशि लगभग ₹240000000 की हो गई है जो कि तत्काल प्रभाव से रोक दी जाए। संस्थान के प्रबंध संचालक श्रीमन शुक्ला के आदेश की इस प्रति को लेकर किसानों ने मीडिया को दिखाया और यह बताने की कोशिश की कि किस प्रकार वे अपनी उपज के मूल्य को लेकर परेशान हैं। लेकिन उन्हें उपज का मूल्य प्राप्त नहीं हो पा रहा है। पानी गिरने की वजह से धान की गुणवत्ता खराब हो गई। भारतीय किसान यूनियन के संभाग अध्यक्ष संतोष राय ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि किसान अपनी उपज के पैसों के लिए परेशान हैं और उन्हें उनकी उपज का मूल्य प्राप्त नहीं हो पा रहा है। अभी धान का मूल्य नहीं मिला है तो गेहूं का पैसा भी उन्हें नहीं मिला है क्योंकि खाता होल्ड पर है आगे खेतों में दलहन की फसलें खड़ी हैं। उनकी खरीद होगी फिर उनका भी पैसा उनके लिए रोक दिया जाएगा। किसान बिना पैसे के कब तक काम करेगा। किसानों ने यह बात भी मीडिया को बताया कि अब खराब गुणवत्ता वाली धान की नीलामी समर्थन मूल्य से कम मूल्य पर की जाएगी और उसके बाद नीलामी से जो पैसा प्राप्त होगा उसी के जरिए किसानों को पैसा दिया जाएगा।
किसानों ने जो दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं उसमें कई तरह के विरोधाभास ही नजर आए जैसे भगवान दास पिता सीताराम यादव इन्होंने सादा धान ₹81312 का सरकार को दिया था उनके यह पैसे खाते में आए। किसान ने सोसाइटी से जो ऋण लिया था उस राशि ₹46133 को काट लिया गया। मगर शेष वह राशि जो किसान को मिल जानी चाहिए थी वह नहीं मिली। बड़ा सवाल ये उठता है कि जब किसानों के पैसे पर सरकार ने होल्ड लगा दिया है तब सरकार ऋण की वसूली किस प्रकार कर रही है? इसी तरह एक अन्य किसान प्रेम लाल पटेल पिता आसाराम जो कि ग्राम पौड़ा के ही हैं और उन्होंने दर्शनी उपार्जन केंद्र में धान बेंची थी लेकिन उसकी राशि आज तक प्राप्त नहीं हुई है। वह अपनी धान की राशि प्राप्त करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

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