डिंडोरी दर्पणमध्य प्रदेश

कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग मे पदस्थ कुंवर सिंह ठाकुर की नियुक्ति के दस्तावेज संदिग्ध आरटीआई में हुआ बड़ा खुलासा!

जिम्मेदार अधिकारी कार्यवाही करने पर नाकाम साबित होते नजर आ रहे हैं कहीं गांधी जी के आगे तो नतमस्तक नहीं है

डिंडोरी , मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले डिंडोरी में तरह-तरह के भ्रष्टाचार गबन और पद का दुरुपयोग करते हुए जम के फर्जीवाड़ा किया जा रहा है और जब शासन की और जनता के बीच पारदर्शिता के लिए एक अधिनियम बनाया गया है जो वह भी अफसरशाही ने अपना गुलाम बना लिया है और उसे अपने तरीके से पेश करते हैं जहां एक और सरकारे पारदर्शिता और ईमानदारी का दावा करती है वहीं दूसरी ओर डिंडोरी जिले के कार्यालय कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग डिंडोरी में पदस्थ कुंवर सिंह ठाकुर पिता हीरालाल ठाकुर की संदिग्ध नियुक्ति ने इन दावों की पोल खोल कर रख दी कुंवर सिंह ठाकुर नामक व्यक्ति ने प्रथम नियुक्ति के समय कूटरचित दस्तावेजों का उपयोग और अन्य प्रमाण पत्र के सहारे सरकारी नौकरी हासिल की है और हैरानी की बात यहां है कि ना उनके पास जाति प्रमाण पत्र न मूल निवासी प्रमाण पत्र ना तो चरित्र प्रमाण पत्र जो यहां साबित करता है कि हिंदू भारतीय नागरिक कैसे इसके बावजूद भी पूरा सरकारी तंत्र इस घोटाले को दबाने में जुठा नजर आ रहा है वहीं दूसरी और अपने अफसर ने उसे बचाने हर संभव प्रयास कर रहे लगभग एक महीना बीतने को आ रहा है और विभाग को भी इस मामले में कई बार मौखिक रूप से सूचित किया जा चुका है इसके बावजूद भी अधिकारी जांच के नाम पर टालमटोल करते नजर आ रहे हैं नई धाराएं नए उपाय ढूंढ रहे हैं इस गंदगी को उजागर करने की कोशिश की आरटीआई कार्यकर्ता प्रमोद पड़वार उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत कार्यालय कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग डिंडोरी मैं पदस्थ कुंवर सिंह ठाकुर टाइम कीपर के द्वारा प्रथम नियुक्ति के समय विभाग के समक्ष प्रस्तुत अपने शैक्षणिक योग्यता एवं अन्य प्रमाण पत्र की जानकारी मांगी गई थी जो कि वह शासकीय दस्तावेजों की श्रेणी में आते हैं और वह नियम पूर्वक देने योग्य है और शासन के नियम और एक्ट के अंतर्गत वहां एक लोक सेवक के दस्तावेज है और और शासकीय कार्यालय में जमा उपरांत वह शासकीय दस्तावेजों की श्रेणी में आते हैं और वहां मांगे जाने पर देने योग्य है पर जानकारी ना प्रदाय करना इससे स्पष्ट होता है की मांग की गई जानकारी जब सार्वजनिक है लोकहित एवं पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए प्रदाय की जा सकती है तो कहीं ना कहीं वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा अधिनियम को मजाक और अपना गुलाम बनाते हुएआवेदक को भ्रामक जानकारी देने या भ्रामक पत्र जानकारी करना सूचना अधिकार अधिनियम की अवहेलना के अंतर्गत आता है जो की धारा 18 में शिकायत योग्य है जिसमें उन्होंने अधिनियम के तहत दंडित करने का प्रावधान भी बनाया गया है पर एक सीधी स्पष्ट और कानूनी मांग लेकिन जो जवाब मिला वहां सरकारी व्यवस्था की नियत को उजागर करने के लिए काफी था
कानून की आड़ में सच्चाई को दबाने की कोशिश, लोक सूचना अधिकारी ने धारा 8,1 और व्यक्ति का जानकारी का हवाला देकर जवाब देने से इनकार भी किया जाता है और यह भी कहा जाता है जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है कई बार तो लिखित लेटर में हैरान कर देने वाली बात तो यहां है कि आखिर विभाग से दस्तावेज जाएंगे कहां वही धारा जो जांच एजेंसियों के लिए बनाया गया है पर उस धारा को जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी उसे अब व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षा के लिए और अब वहां फर्जीवाड़ा और भ्रष्टाचार छुपाने का औजार बन चुकी है जब आरटीआई कार्यकर्ता प्रमोद पड़वार सिविल लाइन निवासी डिंडोरी ने अधीक्षण यंत्री कार्यालय जबलपुर में प्रथम अपील दाखिल करने को कहा तो आनन-फानन मे प्रमोद पड़वार आरटीआई कार्यकर्ता को तुरंत आधी अधूरी जानकारी थमा दिया गया जिम्मेदारों को एक हफ्ते की भीतर दस्तावेज देने के लिए कहा गया जहां दस्तावेजों ने स्पष्ट कर दिया नियुक्ति फर्जी कूटरचित दस्तावेज के आधार पर हुई है जो जांच का विषय है लेकिन लोक निर्माण विभाग में पदस्थ कुंवर सिंह ठाकुर टाइम कीपर लगभग 27, 28 वर्षों से लगातार प्रशासन को चुना लग रहे हैं और हर महीने मोटी सैलेरी पा रहे हैं इसका क्या,क्या विभाग इन पर कार्यवाही करेगा अब तो यहां रिटायरमेंट की नजदीक में भी आ गए हैं इन्होंने प्रशासन को चूना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

अगर दस्तावेज असली है तो चुप्पी क्यों.. यह सवाल अब पूरे सिस्टम से पूछा जाना चाहिए अगर दस्तावेज सही है तो उन्हें देने में हिचक क्यों और अधिनियम की अवहेलना क्यों यदि फर्जी है तो अफसरशाही उन्हें बचाने में क्यों लगी है यहां मामला सिर्फ एक व्यक्ति की फर्जी नियुक्ति का नहीं है यहां पूरे सरकारी तंत्र के चरित्र का आईना है कार्यालय, कार्यपालन यंत्री डिंडोरी मैं पदस्थ कुंवर सिंह ठाकुर की फर्जी भर्ती प्रक्रिया किया गया था सवाल यहां है कि जाति प्रमाण पत्र ,मूल निवासी प्रमाण पत्र ,चरित्र प्रमाण पत्र के बिना सरकारी नौकरी कैसे हासिल की कार्यालय ने एक अपना अलग नियम कानून बना रखा है और देश में अधिनियम लागू हुए लगभग 20 वर्ष बीतने के बाद भी अधिनियम की जानकारी से विभाग की जिम्मेदार अनाविज्ञ है और भिन्न-भिन्न धाराओं और का हवाला देकर बचनेऔर बचाने की कोशिश करते आ रहे हैं आज एक आवेदन महज केवल अफसर शाही के हाथों तक सीमित रह गया है कार्यकर्ता को अपनी बात कहने के लिए जबलपुर कार्यालय, अधीक्षण यंत्री कार्यालय जाना पड़े तो समझ लेना चाहिए कि नीचे से लेकर ऊपर तक कुछ ना कुछ सड़ रहा है.

क्या अभी न्याय रुकेगा या इस बार कोई उदाहरण बनेगा

इनका कहना है, आपके द्वारा जो आरटीआई में जानकारी मांगा गया था आपको विभाग द्वारा दे दिया गया है अब वहां सही है या गलत इसके बारे में कुछ नहीं कह सकता कहकर फोन काट दिया गया.

एम एस धुर्वे कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग डिंडोरी

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