छिंदवाड़ा दर्पण

नजूल की भूमि पर मकान की जगह कॉम्प्लेक्स, कलेक्टर कार्यालय की भूमि के लिए भटक रहा प्रशासन

पांढुरना जबलपुर दर्पण । पांढुरना जिला बने दो साल पूर्ण हो चुका है, परन्तु अभी तक कलेक्टर कार्यालय निर्माण को लेकर भूमि का चयन नही हो सका, जब कि दो दिन पूर्व शाषन ने आबादी बहुलक क्षेत्र में बीजेपी कार्यालय हेतु लीज पर जमीन उपलब्ध करा दी, जिसकी रजिस्ट्री भी हो चली है, परन्तु जिला कलेक्टर कार्यालय निर्माण को लेकर किसी धार्मिक संस्था द्वारा जिस संस्था में सदियों से परंपरागत गणपती भगवान की प्रतिवर्ष स्थापना होती है, ओर प्रसिद्ध लिंगायत समाज का मठ भी है, जो सालों से खुले आसमान में विद्यमान है, इस मठ का निर्माण साल से रुका पड़ा है, परन्तु यही संस्था को दान में मिली जमीन को जिला कलेक्टर को दान में प्रदान कर दी, जिस भूमि पर पूर्व कलेक्टर द्वारा कलेक्टर कार्यालय भवन निर्माण हेतु जमीन का चयन करने की बात सामने आ रही है। परन्तु दशकों से नगर मुख्यालय में नजूल-जमीन का उपयोग रसुखदार निजी संपत्ती के जैसे कर रहे हैं। निवास के लिये शासन से ली गयी बरसों पहले इस जमीन को अब कॉमप्लेक्स और दुकानों की शक्ल देकर लीजधारी करोड़पति बन चुके हैं, वही उसके चलते शासन को करोडों का नुकसान हो रहा है। अब इन रसूकदारों ने इन दिनों में कई मकान व दूसरी दुकानें भी बना ली है, इसके बावजूद इनकी लिज रिनेबल होती रही है। व्यवसायीक उपयोग के अलावा इस नजूल के भुखण्ड को एक-दुसरे को बेचा भी जा रहा है, जिस पर शासन प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है। और सभी नियम छोटे और गरीब लोगों पर लागु करते नजर आता है।

पूर्व में जारी किए थे नोटिस:-

समाचार पत्रों में इस मामले को गत वर्ष लाने के बाद तत्कालीन तहसीलदार श्री गुरुनानक धुर्वे एसडीएम ने सभी नजुल क्षेत्र के लीजधारियों से लीज के दस्तावेज उपलब्ध कराने हेतु नोटिस जारी किये थे। जिसमें उस समय सिर्फ एक परिवार के लीजधारी ने जवाब पेश किया था जहा मकान की जगह दुकान के अलावा एक निजि बैंक संचालित हो रहा था। लेकिन अधिकारी के जाते ही फिर मामला पाइलो में उलझ गया, लिज की जांच के अलावा पूर्व एसडीएम श्री मयंक अग्रवाल ने 17 मार्च 2016 को एक आदेश जारी करते हुये। नजूल भूखण्ड की खरीद बिक्री, नामांतरण और नवीनीकरण पर रोक लगायी थी। लेकिन अधिकारी के जाते ही पहले से घबराये हुये, लीजधारी अपने काम से लग गये, जहां आज भी अपनी निजी जमीन और भवन के लिये तरस रहा है। और करोड़ों का राजस्व देने के बावजूद किराए के भवन-टिनों में रह रहे हैं जिनमें आबकारी विभाग, उद्यानिक विभाग आदि का समावेश है। इसके बावजूद इन रसूकदारों पर रहम किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करती है, जिसमें इन पर किसका वर्धहस्त है और बचाव क्यों हो रहा है। इसके पूर्व भी समाचार पत्रों में इस गंभीर मुद्दे को उठाया था, और इसकी जांच भी प्रारंभ हो गयी थी। इसके बावजूद सिस्टम का दुरुपयोग करके अपनी गर्दन बचाने का प्रयास नजूल पट्टेधारी करते नजर आ रहे हैं,

लीज की शर्तों का उल्लंघन:-

लीज हासिल करते समय दशको पहले जिन नियमों शतों का पालन करने के लिये जो प्रतिबद्धता जतायी थी उन शब्दों का उल्लंघन किया है। इसके बावजूद अबतक किसी अधिकारी ने इन रसुकदारों पर हाथ डालने या सवाल जवाब पूछने की जहमत नहीं उठायी, नियमानुसार लिज किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर हस्तांतरित नहीं होती है, और ना ही उसका दुसरा उत्तराधिकारी होता है। लेकिन फिर भी पांढुर्ना नगर मुख्यालय में कई लिजधारीयों ने इस का उलंघन किया और अपनी संपत्ती की तरह हेर-फेर करके अपनों के नाम चढ़ाया नियम के तहत लिज की उपयोगअवधि तक मिली थी, लेकिन लीजधारियों ने नगर मुख्यालय के इन नजुल पट्टों को अपनी पुस्तैनी जागिर समझा है। इसीलिये मकान की जगह दुकानें बना ली और बहुमंजिला शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बना कर करोडों रूपयों में बेच दी। इसके अलावा आस-पास के रास्तों पर अतिक्रमण करके कब्जा कर लिया जहां पार्किंग के लिये जगह तक नहीं है। सबसे मजेदार बात यह है कि नजुल के भूखण्ड को अपनी प्रापर्टी समझकर रजिस्ट्री तक कर रहे हैं, इस गौरखधंधे पर कुछ ईमानदार अधिकारियों ने रोक भी लगाई। लेकिन सिस्टम की कुछ मछलियों ने तालाब ही गंदा करके रखा हुआ है।

नालों में भी अतिक्रमण:-

कई लीजधारियों के भवन जीर्ण सीर्ण हो चुके है, जिनका जहां तहां निर्माण करने के पहले ना तो नजूल विभाग से एनओसी लेने की कोई जहमत उठा रहा है, और ना ही टाउन एंड कंन्ट्री प्लानिंग विभाग की भी अनुमति या स्वीकृत नक्शे की जरूरत नजर नहीं आ रही है। कुछ सफेद पोशो और सिस्टम के कुछ अधिकारी के वजह लीजधारीयों ने सिस्टम को दीमक की तरह चाट लिया है, और नजूल पट्टो से लेकर नदी व नालों में भी अतिक्रमण कर लिया है। शिकवे शिकायत करने वालों को सदैव दबाने व प्रताडित करने का काम उपरोक्त महाशय करते है, लेकिन कहते है उपर वाले के यहां इंसाफ में देर हो सकती है अंधेर नहीं, कभी न कभी कोई ऐसा अधिकारी आयेंगा जो नियमानुसार कार्रवाई करके इन रसुकदारों पर अंकुश लगाएगा। तब-तक ये एक दूसरे को ऑल इंज वेल कहकर दिलासा दे सकते हैं।

जनता की मांग कलेक्टर कार्यालय कृषि मंडी या लीज पर दी भूमि पर बने:-

शासन के पास नगर में जगह नही, तो लीज को खाली पर जनता हित को देखते हुए, जिला कलेक्टर कार्यालय नगर की परिधि के अंदर आराम से बनाया जा सकता है, परन्तु रसूखदारों की पकड़ इतनी मजबूत है, की सरकारी नुमाइंदे इन पर हाथ नहीं डालते, जिसके चलते कलेक्टर कार्यालय नगर के बाहर तीन किलोमीटर की दूरी के अंतराल पर बनाये जाने की कोशिश की जा रही है, परन्तु इस विषय को लेकर नगर की जनता में भारी आक्रोश देखा जा रहा है, जब कि प्रशासन के पास बड़े क्षेत्रफल में नगर के बीचोबीच कृषि मंडी की जगह है, जहा पर भी कलेक्टर कार्यालय का निर्माण किया जा सकता है। कृषि मंडी परिसर में यदि कलेक्टर कार्यालय का निर्माण होगा तो रेल्वे स्टेशन, बस स्टैंड, जिला कोर्ट, अस्पताल, ओर मार्केट पास में होगा, ओर क्षेत्र की जनता के साथ अन्य तहसील के निवासी भी आसानी से कलेक्टर कार्यालय आ जा सकते है। जिसके चलते उनकी आर्थिक पूंजी की बचत ओर समय की बचत भी होगी।

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