प्रकृति संरक्षण संवर्धन का संदेश है श्रीकृष्ण लीला: श्री नरसिंह देवाचार्य जी महाराज

जबलपुर दर्पण । परिवारिक मान्यताओं को मानकर दाम्पत्य जीवन सुखमय हो जाता है।संतान को सामाजिक सांस्कृतिक शिष्टाचार मूल्यों की शिक्षा अवश्य देना चाहिए।श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ के षष्ठ दिवस पर श्रीमद् जगदगुरू डॉ स्वामी नृसिंहदेवाचार्य जी महाराज ने कहा – भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने गिरिराज गोवर्धन की पूजा कर प्रकृति पूजन का आदेश दिया है। ये अद्रि अर्थात पर्वत, नदियाँ और गायों को पूजन से परम कल्याण होता है। इन्द्र ने भगवान की दिव्य स्तुति की है। श्रीकृष्ण सुरभी गौ तथा इन्द्र की पूजा स्वीकार कर देवताओं को आनन्दित किया है। इसके बाद प्रभुने सुन्दर वेणुबादनकर समूची प्रकृति को स्तब्ध कर दिया। यह वेणु अर्थात बाँसुरी क्या है, स्वामी जी ने कहा जिस बॉश से यह बनी है वह कोई और नही बल्कि “बंशस्तु भगवान रुद्र:” साक्षात रुद्र ही बांसुरी वेणु के रूप में भगवान के हाथों में शोभा प्राप्त कर रहे। दिव्यमहारास का बर्णन करते हुए जगदगुरु जी ने कहा ये गोपियाँ साक्षात श्रुति रुपा है अतः वेदों की रिचाएं ही मानो गोपी भाव को प्राप्त हुई है। गोपी शब्द की सुन्दर व्याख्या करते हुए स्वामीजी ने कहा-गोभिः = इन्द्रियै, कृष्णरसं पिबति” इति गोपी । दिव्य महारास के मध्य जब गोपियों के मन में सूक्ष्म मद” प्रभु को दिखाई दिया तो उन सबके मध्य से अंतर्ध्यान हो गये, उस समय “गोपी गीत ” के माध्यम से इन देवियों ने जो भावाभि व्यक्ति प्रगट की उसकी कोई तुलना नहीं। विविधलीलाओं का बर्णन करते हुए महाराज श्री ने माता रुक्मिणी ब श्री कृष्ण के पावन मंगल परिणय का वर्णन किया है। व्यासपीठ का पूजन मुख्य यजमान शिवप्रसाद गर्ग जी कृष्ण कुमार गर्ग जी आशीष गर्ग जी योगेश गर्ग जी श्रीमती रुचि गर्ग श्रीमती प्रिया गर्ग श्रीमती मंजरी गर्ग समस्त गर्ग परिवार ने किया।



