साहित्य दर्पण

दर्द की जुबां नहीं होती

दर्द की जुबां नहीं होती फिर ही कराहती है दर्द ।
इक़ कराह में ही अपनी दास्तां सुनाती है दर्द ।।

दर्द का एहसास है दिल की एक कोने में ,
सुर्ख होठों से मुस्कुराकर वो छुपाती है दर्द ।

एहसास ए दर्द और दिल में गमों के आहट ,
ये शाम की तनहाइयों में ही बताती है दर्द ।

कुदरत का बक्सा ये तनहाई दर्द का आईना है ,
इन्हीं तनहाइयों में अपना चेहरा दिखाती है दर्द ।

दर्द की जुबां नहीं होती फिर भी कराहती है दर्द ।
इक़ कराह में ही अपनी दास्तां सुनाती है दर्द ।।

स्वरचित एवं मौलिक
मनोज शाह ‘मानस’
नई दिल्ली-110015
मो.नं.7982510985

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