जबलपुर दर्पण

‘घूसखोर पंडत’ मामला परिवादी के बयान दर्ज

जबलपुर दर्पण। फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के विवादित शीर्षक को लेकर ब्राह्मण समुदाय की भावनाएं आहत करने के आरोप में निर्माता-निर्देशक नीरज पांडे और ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स के विदेश में निवासरत शीर्ष अधिकारियों रीड हेस्टिंग्स – अध्यक्ष, नेटफ्लिक्स (यूएसए) ,टेड सरंदास -सह-मुख्य कार्यकारी अधिकारी, नेटफ्लिक्स (यूएसए)
बेला बजरिया – मुख्य सामग्री अधिकारी, नेटफ्लिक्स (यूएसए) के सहित नेटफ्लिक्स की भारतीय वितरक मोनिका शेरगिल के विरुद्ध दायर आपराधिक मानहानि परिवाद में न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी (जेएमएफसी) की अदालत ने सभी पांचों प्रस्तावित अभियुक्तों के विरुद्ध नोटिस जारी कर दिए हैं। न्यायालय ने परिवादी के बयान दर्ज करने के पश्चात प्रकरण में उक्त आदेश पारित किया।

न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी श्री पंकज सविता ने परिवादी पटकथा लेखक, फिल्मी कलाकार एवं ज्योतिषी पं. व‌मधय प्रदेश की सबसे प्राचीन विप्र संस्था मध्य प्रदेश प्रगतिशील ब्राह्मण महासभा के सक्रिय सदस्यवै पं..0वैभव पाठक के शपथ-पत्र एवं प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर प्राथमिक स्तर पर आपराधिक मानहानि के अपराध पर अभियुक्तों को तलब किया है। न्यायालय के समक्ष परिवादी के अधिवक्ताओं ने तर्क किया कि यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात फिल्म का शीर्षक परिवर्तित किया जा रहा है, किंतु उस शीर्षक के व्यापक प्रचार-प्रसार से समाज के एक बड़े वर्ग की प्रतिष्ठा को जो क्षति पहुंची है, वह अपरिवर्तनीय है और उसके लिए अभियुक्तों को विधि सम्मत उत्तरदायी होना होगा।

परिवादी की ओर से अधिवक्ता असीम त्रिवेदी, प्रशांत अवस्थी,पंकज तिवारी,प्रशांत सिरमोलिया, विनीत टेहेनगुनिया, रीतेश शर्मा,शुभम पाटकर एवं अरविंद सिंह चौहान ने तर्क प्रस्तुत किया कि ‘पंडित’ शब्द भारतीय संस्कृति में विद्या, वैदुष्य और धार्मिक पवित्रता का पर्याय है। इसी शब्द के लोकभाषा प्रचलन ‘पंडत’ को जानबूझकर ‘घूसखोर’ जैसे कलंकपूर्ण विशेषण से जोड़ना सम्पूर्ण ब्राह्मण समुदाय की सामाजिक अस्मिता पर आघात है। यह केवल किसी काल्पनिक पात्र का चरित्र-चित्रण नहीं, वरन् एक पूरे वर्ग को बदनाम करने का सुनियोजित प्रयास है।

परिवादी पं. वैभव पाठक ने परिवाद में कहा है कि यह केवल एक फिल्म के शीर्षक का मामला नहीं है, यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक गरिमा का प्रश्न है। जिस ‘पंडित’ शब्द को पंडित जवाहरलाल नेहरू और पंडित अटल बिहारी वाजपेयी जैसी विभूतियों ने अपने व्यक्तित्व से गौरवान्वित किया, उसे ‘घूसखोर’ की संज्ञा देना भारतीय संस्कृति और उसकी परंपराओं का अपमान है।

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