मृत गायों से लेकर आवारा कुत्तों तक — क्या एक ही कंपनी पर मेहरबान निगम?

जबलपुर दर्पण । मृत गायों के बिनिस्टीकरण को लेकर उठे विवाद ने अब बड़ा रूप ले लिया है। बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े नेताओं ने प्लांट पहुंचकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया।
स्थिति तनावपूर्ण होने पर मढ़ोताल पुलिस मौके पर पहुंची और प्लांट में कार्यरत कर्मचारियों व नौकरों को पूछताछ के लिए थाने ले जाया गया।
संगठनों ने पुलिस प्रशासन को चेतावनी दी है कि केवल दिखावटी कार्रवाई स्वीकार नहीं होगी।
कौन है असली संचालक?
निगम सूत्रों में चर्चा है कि बिनिस्टीकरण का ठेका जिस निजी कंपनी को दिया गया है, उसके संचालन में भाजपा से जुड़े एक स्थानीय प्रभावशाली नेता तथा नागपुर से आए एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका बताई जा रही है, जो पूर्व में जबलपुर में पत्रकारिता से जुड़ा रहा है।
शहर में यह भी चर्चा है कि कंपनी का संचालन परोक्ष रूप से कुछ राजनीतिक संरक्षण के तहत हो रहा है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
ठेका कैसे मिला?
सूत्रों के अनुसार:
ठेका प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
यह भी चर्चा है कि टेंडर शर्तों में फेरबदल कर पात्रता को सीमित किया गया।
विपक्षी आवाज़ें यह पूछ रही हैं कि क्या प्रतिस्पर्धी कंपनियों को समान अवसर दिया गया था?
यदि प्रक्रिया में अनियमितता हुई है तो यह प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
भुगतान की टाइमलाइन: 25 लाख प्रतिमाह का खेल?
बताया जाता है कि मृत व आवारा पशुओं के बिनिस्टीकरण के नाम पर लगभग ₹25 लाख प्रतिमाह का भुगतान किया जा रहा है।
आरोप हैं कि:
प्लांट में आवश्यक इंसिनरेटर मशीनें या तो बंद पड़ी हैं या पर्याप्त क्षमता में नहीं ।



