सागौन प्लांटेशन में लगी आग, लाखों का नुकसान

मनीष श्रीवास जबलपुर दर्पण । जबलपुर जिले की सीमा वन परिक्षेत्र सरदा का मामला फिर एक बार सुर्ख़ियों एवं चर्चा में गरमाया हुआ हैं। जहां वन मण्डल के द्वारा लगाए गए एक साल पहले सागौन के पौधों में आग लगने से वे पूरी तरह से जल कर खराब हो गए हैं।
वन क्षेत्रों में चाहें पेड़ पौधे हो या फिर जीव जंतुओं सहित वन प्राणी इनकी सुरक्षा और सुविधाओं की जवाबदेही वन विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारियों की अहम भूमिका होती हैं।
लेकिन इस प्रकार की अनदेखी और इतनी मात्रा में सागौन के पौधों के जल जाने से किसी भी अधिकारी ने इस ओर कोई रुचि ही नहीं दिखाई हैं। क्या वन अमला चाहता हैं कि जब मेरे पास इसकी शिकायत कोई करेगा तब जाकर कुछ कार्यवाही होगी नहीं तो जो हो रहा हैं वह जानते हुए भी अंजान बना बैठा हुआ हैं।
कैसे जल गए सागौन के पौधे – प्राप्त जानकारी के अनुसार सरदा वन परिक्षेत्र सिहोरा अंतर्गत आने वाले आर ऍफ़ 45 में कुल जमीन के 30 हेक्टेयर
मिश्रित प्लांटेशन में एवं वर्षों से अधिक समय पहले सागौन सहित विभिन्न प्रकार के पौधों का वृक्षारोपण किया गया था। लेकिन विगत कुछ दिनों पहले यहां अचानक आग की चपेट में आने वाले जंगल के सबसे कीमती एवं महंगे सागौन के पौधों में आग लगने से वह पूरी तरह से खराब हो गए हैं।
हर वर्ष लाखों रुपए इन वन सुरक्षा के लिए वन विभाग एवं राज्य सरकार खर्च तो करती है। पर इनकी उचित सुविधा एवम् सुरक्षा की जवाबदेही भी वन विभाग के कर्मचारी पर रहतीं हैं। अब सवाल उठता हैं कि जब इनकी सुरक्षा में वन कर्मचारी 24 घण्टे की ड्यूटी पर तैनात रहने के बाद भी प्लांटेशन बीट में लगे सागौन के पौधों में आग लग गई। और किसी को इसकी सूचना जानकारी तक नहीं।
सागौन टीक के पौधों/जंगलों में लगी आग दावानल एक गंभीर स्थिति है, जो आमतौर पर फरवरी-अप्रैल के बीच सूखी पत्तियों और तेज हवाओं के कारण फैलती है, जिससे भारी वन और आर्थिक नुकसान (लाखों का नुकसान) होता है। इसकी जांच के लिए वन विभाग, स्थानीय पुलिस और तहसील प्रशासन की संयुक्त टीम को मौके स्पॉट का मुआयना, गवाहों के बयान और फोरेंसिक सबूत (जैसे-माचिस, बीड़ी, या ज्वलनशील पदार्थ) एकत्र करने चाहिए।
जांच और मुख्य धारा –
मानव मवेशी चराने वालों द्वारा महुआ/तेंदूपत्ता बीनने या सूखी घास हटाने के लिए जानबूझकर लगाई गई आग
पड़ोसी खेत से आग फैलना: अक्सर आसपास के खेतों में खरपतवार या पैरा (पराली) जलाने से आग सागौन के रोपण में फैलती है।
बिजली के तारों से चिंगारी: वन क्षेत्र से गुजरने वाली हाई-टेंशन लाइनों से आग लगना।
बीड़ी/सिगरेट का फेंकना: राहगीरों द्वारा लापरवाही से फेंकी गई जलती हुई बीड़ी।
जांच की प्रक्रिया- आग का केंद्र बिंदु खोजना, जहां से आग फैलनी शुरू हुई थी।
साक्ष्य संकलन – आग लगने के स्थान से आग लगाने वाले उपकरण (माचिस, बोतल, जले हुए कपड़े) खोजना।
जाँच-पड़ताल स्थानीय ग्रामीणों से पूछताछ और वन रक्षकों की लापरवाही की जाँच करना।
नुकसान का आंकलन – जले हुए सागौन के पौधों, लकड़ी और जैव विविधता का विवरण तैयार करना।
बचाव और प्रबंधन – फायर लाइन मार्च से पहले सागौन के ब्लॉकों के चारों ओर 3-5 मीटर चौड़ी पट्टी साफ करें ताकि आग एक ब्लॉक से दूसरे में न फैले।
सूखी पत्तियों का प्रबंधन: फरवरी से पहले वन तल फारेस्ट फ्लोर से सूखी पत्तियों को सुरक्षित रूप से जलाना या हटाना चाहिए।
सतर्कता जरूरी – शुष्क मौसम में गश्त पेट्रोलिंग बढ़ाना और स्थानीय लोगों को जागरूक करना।
यदि आपको लगता है कि आग जानबूझकर लगाई गई है, तो वन रेंजर या पुलिस स्टेशन में तत्काल एफआईआर दर्ज कराएं । साथ ही पंचनामा तैयार कराएं।
सागौन के पौधों या जंगल में आग लगाने की घटना भारतीय वन अधिनियम 1927 और भारतीय दंड संहिता आई पी सी के तहत एक गंभीर अपराध है। इसके लिए धारा 26 वन आरक्षित में आग लगाने पर प्रतिबंध और आई पी सी की धारा 435/436 के तहत कड़ी सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
प्रमुख कानूनी धाराएं और प्रावधान:
भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 26 आरक्षित वनों में आग लगाना, या ऐसी लापरवाही करना जिससे आग फैले, अवैध है। इसमें कारावास 6 महीने से 5 साल तक और भारी जुर्माना हो सकता है।
भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 33 संरक्षित वनों में आग लगाने पर यही सजा लागू होती है।
आई पी सी की धारा 435/436: किसी की संपत्ति सागौन के पेड़/पौधे को जानबूझकर आग से नष्ट करने पर 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 यदि आग से वन्य जीवों को नुकसान होता है, तो और भी सख्त कानून लागू होते हैं।


