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पत्रकार विनोद दुआ पर भाजपा नेता ने दर्ज कराई एफआईआर

लोकतंत्र पर हमला है ?

दिल्ली। कुछ दिन पहले देश के वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता नवीन कुमार ने FIR दर्ज करवाई है।यह घटना पत्रकार जगत को उद्वेलित करने वाली तो है पर लोकतंत्र के हिमायती बुद्धीजीवियों के लिए भी खतरे के आलार्म से कम नहीं होनी चाहिए।विरोधी दलों की बात करना अब बेमानी सा होगया है।आजादी के बाद से इतना गया- गुजरा और डरा- सहमा विरोधी दल कभी नहीं देखा गया।
एसा नहीं है कि पत्रकारों पर हमले या उन्हें फसाने के प्रयास व उनका उत्पीडन पहले कभी नहीं हुए हैं। पर इन छै सालों में राष्ट्रवाद की आड में तानाशाही पृवत्ति ने जो परिपाटी विकसित की है वह शेहतमंद लोकतंत्र को बीमार सा बना रही है।पत्रकार विनोद दुआ पर FIR इसी मानसिकता को प्रतिविम्बित करती है भारत में दो तरह के पत्रकार देखे जाते हैं एक वे जो अपनी सुविधा के अनुसार पत्रकारिता करते हैं और सरकार के अच्छे बुरे सभी कार्यों की अंध प्रशंसा करते हुए सदैव सरकार के कृपा पात्र बने रहते हैं।दूसरे वे लोग हैं जो कंरजिया से लेकर रविश और विनोद दुआ जैसे पत्रकार की परम्परा से आते हैं।इस परम्परा के पत्रकार सरकार की गलत नीतियों और उनके जनविरोधी रवैये के विरुद्घ तीखे और आलोचनात्मक प्रश्न पूंछकर सरकार और सत्ता पर काविज लोगों को याद दिलाते हैं कि यह काम संविधान के विरुद्ध है, जनता और देश के विरुद्ध भी है इससे स्वाभाविक रुप से सरकार में बैठे लोग असहज हो जाते हैं ।
भारत में लोगों को अपने विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के मूल अधिकार द्वारा सुनिश्चित की गई है यहीं से पत्रकारों को भी संरक्षण प्राप्त होता है।लोकतंत्र में मीडिया का स्वतंत्र होना लोकतंत्र के सफलता की गैरंटी मानी गई है।विनोद दुआ जैसे पत्रकार सरकार से प्रश्न पुछकर व सरकार को उनकी गलती बता कर सरकार को अगाह ही तो करते हैं।सरकार को उनका उपकार मानना चाहिए।न की FIRदर्ज करवाया कर सच्चाई से मुंह मोडना चाहिए।
सुविधा परस्त या चाटूकारिता करने वाले लोग या तथाकथित पत्रकार सरकार की अंधभक्ति में भाडगिरी करते हैं पत्रकारिता नहीं।ये न केवल लोकतंत्र के लिए घातक हैं वरन सरकार को भी सत्य से दूर रखते हैं।सरकार को बडा दिल दिखाते हुए विनोद दुआ जैसे पत्रकारों को प्रोत्साहन देना चाहिए और विनोद दुआ पर दर्ज FIR तुरंत वापस लेनी चाहिए । निरंकुशता या स्वेच्छारिता अंततः पतन की सकरी व अंधेरी गलियों की ओर ही ले जाती ।बाबा कबीर ने भी कहा है “निदंक नियरे राखिये, आंगन कुटी छबाय।
बिन पानी ,साबुन बिना निर्मल करे सुवाय।।”

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