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दुनिया ने जाना भारत की जीवन पद्धति का महत्व – केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल ।

भोपाल। हम अपने पुरातन सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति बैक फुट पर क्यों हैं। इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय के अधिकारियों के बीच यह सवाल था केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री प्रहलाद पटेल का। वह गुरूवार को संग्रहालय की पहली ऑनलाइन प्रदर्शनी के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान सामने आई अनभिज्ञता को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने अधिकारियों को सख्त लहजे में यह नसीहत देने से भी बाज नहीं आए, कि सभी को देश दुनिया की जानकारी से पहले राज्य के सांस्कृतिक पुरातन महत्व की जानकारी भी होनी चाहिए। इस अवसर पर संस्थान के निदेशक प्रवीण मिश्रा सहित बडी संख्या में अधिकारी-कर्मचारी मौजूद थे।
दरअसल केंद्रीय मंत्री ने सभी अधिकारियों का परिचय लेते हुए मप्र की नर्मदाघाटी सभ्यता को लेकर सवाल किया था। इस पर यहां मौजूद अधिकारियों ने संतोष जनक जबाव नहीं दिया। इससे श्री पटेल ने अनभिज्ञता मानते हुए कहा कि हम दुनिया की पहली सभ्यताओं में मोहनजोदडो और हडप्पा को मानते हैं, लेकिन धरती में मानव की उत्पत्ति की साथ अस्तित्व में आई नर्मदा व सोन की सभ्यता को नहीं मानते हैं, ऐसा क्यों है। जबकि इस बात के प्रमाण मप्र और गुजरात के आसपास बिखरे पड़े हैं। दुनिया भी मानती है कि धरती से विलुप्त हुए डायनासोर के 26 प्रमुख केंद्र में 17 मप्र में स्थित हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम इन बातों को नजरअंदाज कर दुनिया के सामने प्रमाण के साथ नहीं प्रस्तुत कर पा रहे हैं, तो इसका मतलब यही है कि कहीं न कहीं गैप है और हम यह कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। जबकि श्रुति और स्मृति के आधार पर सामने आई जानकारियों को हम मान्यता देते हैं। ऐसे में उन्होंने सवाल भी किया कि हम यदि इनको मान्यता नहीं देंगे, तो यह काम कौन करेगा। जबकि दुनिया हमारी मान्यताओं पर सवाल खड़े नहीं कर पाई है। ऐसे में इनको न तो कमतर बताना ठीक है और न ही ऑकलन करते समय पूर्वग्रह से युक्त होना ठीक है। यह बात समझना चाहिए कि इसके पहले हमारी बातों को कमतर बताने का षडयंत्र वर्षों तक रचा गया था।

कोरोना काल में दुनिया ने जाना भारत की जीवन पद्धति का महत्व
: भारत की संस्कृति और सभ्यता के महत्व को बताते हुए कहा कि यह जीवन पद्धति दुनिया में सर्वोत्कृष्ट है। कोरोना संक्रमण काल में यह दुनिया ने भी मान लिया है। अभिवादन के लिए हाथ मिलाने के बजाय नमस्ते करो, यह हमने नहीं इजराइल के प्रधानमंत्री ने कहा। उन्होंने कहा कि दुनिया में रहने वाले दूसरे लोगों के मुकाबले यह संक्रमण भारत में ज्यादा विकराल रूप नहीं ले पाया इसके पीछे कारण यहां की जीवन पद्धति ही है। दुनिया के लोग भी मानते हैं कि कोरोना संक्रमण के परिवहन में पैरों का योगदान अधिक है। जबकि हमारी संस्कृति में घर में घुसने से पहले हाथ पैर धोने की आदत रची-बसी है।

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