संपादकीय/लेख/आलेख
तीस और पचास का अंतर
सांसद और आम आदमी में
यहीं सबसे बड़ा अंतर है।
आपके तीस कम हुए,
हमारे हुए पचास।
बहुत ही विकट स्थिति थी,
जीवन की आधी
हो गई थी मिठास।
दबे-छुपे और सहमें सहकमी,
सुन रहे थे मेरे आस-पास।
क्या? करते उनके भी मन में
मालिक के प्रति
एक ही पल में
आ चुकी थी खटास।
क्या? करते इतनी बड़ी थी,
परिवार की जिम्मेदारी,
मन में आता उनके खूब
काश, छोड़ सकते नौकरी।
तभी दिखी बड़ी सी,
आफत की टोकरी।
सोचते आपके जैसे
हमारे भी तीस ही होते
तो कोई बात नहीं थी।
ये आधी-अधूरी,
जीवन में प्यास तो न होती।
आखिर जिन्दगी भर की फॉस तो न होती।
-संजय एम. तराणेकर, इन्दौर, मध्यप्रदेश 098260-25986



