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कुलपति बनने के लिए परिक्रमा लगाने लगे दावेदार


अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय को मुखिया का इंतजार
रीवा दर्पण। विंध्य प्रदेश के पहले विश्विविद्यालय में कुलपति की खाली कुर्सी को लेकर अचानक फिर गहमा-गहमी बढ़ गई है। जब से प्रोफेसर पीयूष रंजन अग्रवाल ने इस्तीफा दिया है तब से मास्टरमाइंड संभावित दावेदारों की बेचैनी बढ़ गई है। एक बार पुनः सबसे बड़े और महत्वपूर्ण पद में बैठने के लिए संभावित दावेदारों में शामिल मास्टरमाइंड लोगों ने चरण वंदना का सिलसिला तेज कर दिया है। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा का नया कुलपति बनने के लिए चाणक्य कहे जाने वाले मास्टरमाइंड दावेदारों ने अपने राजनैतिक आका की परिक्रमा लगाना शुरू कर दिया है। उपचुनाव का प्रभारी बनाए जाने की वजह से इन दिनों रीवा जिले के प्रायोजित विकास पुरुष का ठिकाना अनुपपुर बना हुआ है। राजनैतिक आका की चुनावी व्यस्तता को देखते हुए मास्टरमाइंड दावेदारों में शुमार एक पूर्व कुलपति और अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के एक सीनियर प्रोफेसर बराबर विकास पुरुष की परिक्रमा लगाते हुए अनुपपुर में देखे जा रहे हैं। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा में फिलहाल कुलपति का प्रभार प्रोफेसर एनपी पाठक के कंधों पर है, जो सामान्य तरीके से विश्विद्यालय संचालन में अपनी मजबूत भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि स्पष्टवादी विचारधारा वाले प्रभारी कुलपति प्रो एनपी पाठक की कार्यशैली अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में एक विशेष गुट को बिल्कुल रास नहीं आ रही है। यही वजह है कि अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा का कुलपति बनने के लिए दावेदारों ने उछल कूद तेज कर दी है।

साल भर के पहले प्रो अग्रवाल ने दे दिया इस्तीफा
अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय को राजनीति का अखाड़ा भी कहा जाता है। यहां पर पढ़ाने वाले और काम करने वाले लोगों में नेताओं की संख्या चौंकाने वाली है। गुटो में बंटे अधिकारियों और कर्मचारियों का मन मुटाव भी किसी से छिपा नहीं है। साल 2019 में भी नये कुलपति को लेकर दावेदारों के बीच बराबर जोर आजमाइश देखने को मिली थी। रीवा के विकास पुरुष के सहारे लोकल दावेदारों ने राजभवन का दरवाजा भी मजबूती के साथ खटखटाया था, लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था इसलिए विकास पुरुष की पसंद वाले प्राध्यापकों को दरकिनार करते हुए मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल लालजी टंडन ने अपनी पसंद के प्रोफेसर पीयूष रंजन अग्रवाल को अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा का नया कुलपति बना दिया। स्पष्टवादी विचारधारा वाले कुलपति प्रो अग्रवाल को लोकल मंडली ने शीशे में उतारने का भरसक प्रयास किया पर अफसोस सफलता नहीं मिल पाई। नेतागिरी करने वाले अधिकारियों के लिए कुलपति टेंशन साबित होने लगे। 13 सितंबर 2019 को नये कुलपति का आदेश जारी हुआ था, लेकिन अचानक साल भर के पहले ही कुलपति प्रो पीयूष रंजन अग्रवाल ने इस्तीफा दे दिया। 31 अगस्त 2020 को डा अग्रवाल ने पारिवारिक समस्याओं के कारण इस्तीफा दे दिया। हालांकि इसके पीछे स्थानीय लूट खसोट करने वाले गुट की राजनीति को बड़ी वजह बताया जा रहा है।

और फिर राज्यपाल ने सुनाई थी खरी-खोटी
सूत्रों ने बताया कि जब अगस्त और सितंबर 2019 के दौरान अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के लिए नए कुलपति की तलाश चल रही थी उस दौरान पूर्व मंत्री और रीवा विधायक राजेंद्र शुक्ल ने तत्कालीन राज्यपाल लालजी टंडन के सामने कुछ संभावित दावेदारों के नाम आगे बढ़ाए थे। विकास पुरुष के साथ में रीवा सांसद जनार्दन मिश्रा और सेमरिया विधायक केपी त्रिपाठी राज्यपाल लालजी टंडन से मिलने राजभवन पहुंचे थे। पूर्व मंत्री ने जिस लिस्ट को आगे बढ़ाया उसे देखते ही तत्कालीन राज्यपाल दंग रह गए थे क्योंकि उसमें कांग्रेसी पृष्ठभूमि वाले प्राध्यापकों के नाम शामिल थे। विकास पुरुष ने अपनी तरफ से पूर्व कुलपति प्रोफ़ेसर रहस्यमणि मिश्रा, डॉ सुनील तिवारी सहित एक अन्य नाम कुलपति के लिए आगे बढ़ाया था। पूर्व मंत्री की लिस्ट को देखकर राज्यपाल ने कहा कि आप कैसे विधायक हैं जो संघ से जुड़े लोगों के बजाय कांग्रेसी पृष्ठभूमि वाले प्राध्यापकों को कुलपति बनाना चाहते हैं। सूत्र बताते हैं कि मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल लालजी टंडन ने संघ के बड़े पदाधिकारियों को भी पूरे मामले से अवगत कराया था, जिसका परिणाम जब मध्यप्रदेश में चौथी बार भाजपा की सरकार बनी तब बखूबी देखने को मिला? सूत्रों ने बताया कि एक बार फिर अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रहस्य मणि मिश्रा, डॉक्टर सुनील तिवारी सहित कुछ अन्य स्थानीय दावेदार अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय का नया कुलपति बनने के लिए अनूपपुर में जोर आजमाइश करते देखे जा रहे हैं। अब देखना क्या है की राजभवन संघ पृष्ठभूमि से जुड़े किसी प्राध्यापक को अवधेश प्रताप विश्वविद्यालय रीवा का नया कुलपति बनाता है या फिर विकास पुरुष अपने पसंद के कांग्रेसी पृष्ठभूमि वाले प्राध्यापक को कुलपति बनवाने में सफल हो जाते हैं?

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