मण्डला दर्पणमध्य प्रदेश

वर्तमान समय की आवश्यकता है “यज्ञ

मण्डला। अंजनिया- ग्राम नरैनी में चल रहे श्रीअष्ठलक्ष्मी महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में माता अमृत लक्ष्मी की पूजन की गई । श्री श्रीमद भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया एवं संध्या काल मे 11000 दीपक जलाए गए यज्ञ के महत्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए नीलू महाराज जी ने बताया कि हमारी प्राचीन संस्कृति को अगर एक ही शब्द में समेटना हो तो वह है यज्ञ। यज्ञ शब्द संस्कृत की यज् धातु से बना हुआ है जिसका अर्थ होता है दान, देवपूजन एवं संगतिकरण। भारतीय संस्कृति में यज्ञ का व्यापक अर्थ है, यज्ञ मात्र अग्निहोत्र को ही नहीं कहते हैं वरन् परमार्थ परायण कार्य भी यज्ञ है। यज्ञ स्वयं के लिए नहीं किया जाता है बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए किया जाता है। आज जब पूरा विश्व महामारी से जूझ रहा है तब यज्ञ ही इससे उबरने में सहायक हो सकता है यज्ञ का प्रचलन वैदिक युग से है, वेदों में यज्ञ की विस्तार से चर्चा की गयी है, बिना यज्ञ के वेदों का उपयोग कहां होगा और वेदों के बिना यज्ञ कार्य भी कैसे पूर्ण हो सकता है। इसलिए यज्ञ और वेदों का अन्योन्याश्रय संबंध है।जिस प्रकार मिट्टी में मिला अन्न कण सौ गुना हो जाता है, उसी प्रकार अग्नि से मिला पदार्थ लाख गुना हो जाता है। अग्नि के सम्पर्क में कोई भी द्रव्य आने पर वह सूक्ष्मभूत होकर पूरे वातावरण में फैल जाता है और अपने गुण से लोगों को प्रभावित करता है। हवन सामग्री में उपस्थित स्वास्थ्यवर्धक औषधियां जब यज्ञाग्नि के सम्पर्क में आती है तब वह अपना औषधीय प्रभाव व्यक्ति के स्थूल व सूक्ष्म शरीर पर दिखाती है और व्यक्ति स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता चला जाता है।   हवन सामग्री में शरीर के सभी अंगों को स्वास्थ्य प्रदान करने वाली औषधियां मिश्रित होती हैं। यह औषधियां जब यज्ञाग्नि के सम्पर्क में आती हैं तब सूक्ष्मीभूत होकर वातावरण में व्याप्त हो जाती हैं जब मनुष्य इस वातावरण में सांस लेता है तो यह सभी औषधियां अपने-अपने गुणों के अनुसार हमारे शरीर को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती हैं। इसके अलावा हमारे मनरूपी सूक्ष्म शरीर को भी स्वस्थ रखती हैं। क्योंकि यज्ञ करने से व्यष्टि नहीं अपितु समष्टि का कल्याण होता है। अब इस बात को वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि यज्ञ करने से वायुमंडल एवं पर्यावरण में शुद्धता आती है। संक्रामक रोग नष्ट होते हैं तथा समय पर वर्षा होती है।25 फरवरी को विशाल संत सम्मेलन का आयोजन किया गया है जिसकी अध्यक्षता जगतगुरु द्वाराचार्य डॉ.स्वामी स्यामदास जी महाराज करेंगे।

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