साहित्य दर्पण

तुम तो पढ़े लिखे हो

सोचता हूं क्यों पढ़ा मैं तानों को जो सुनता हूं

 अनपढ़ रहता तो ठसके से कहता मैं तो अनपढ़ हूं 

जिम्मेदारी जवाबदारी से बचता कहता मैं तो अनपढ़ हूं

  समस्या बड़ी विचित्र है जिसका मैं पीड़ित हूं 

 व्यवहारिक शिक्षा जन्म से मिलती है 

इसके सब परिपक्व विशेषज्ञ शिक्षित हैं 

काम अढ़ें तो जवाबदारी से बचोशान से कहो मैं अनपढ़ तुम पढ़े लिखे हो
समस्या बड़ी विचित्र है जिसका मैं पीड़ित हूं

 जिसको सबकुछ समझता है उनसे मैं पीड़ित हूं

 कहते हैं हम अनपढ़ है पढ़े लिखों को ताने देते हैं

 पढ़े लिखों को तानों का मैं पीड़ित हूं 
काम बन गया तो अपने को होशियार कहते हैं

 बिगड़ गया तो कहते हैं मैं तो अनपढ़ हूं

 तुम तो पढ़े लिखे हो फिर क्या किए पढ़े लिखों को तानों का में पीड़ित हूं 
लेखक- कर विशेषज्ञ, साहित्यकार, स्तंभकार, कानूनी लेखक, चिंतक, कवि, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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