जल शक्ति अभियानः गर्मी में गहरी जुताई पर किसानों को दिया प्रशिक्षण

भारत सरकार द्वारा जल शक्ति अभियान का आयोजन 22 अप्रैल से 30 अप्रैल नवंबर तक किया जा रहा है। इसी तारतम्य में कृषि विज्ञान केन्द्र मण्डला द्वारा गर्मी की गहरी जुताई का महत्व विषय पर 11 मई को डायल आॅउट काॅन्फे्रन्स काॅल के द्वारा रिलायंस फाउण्डेषन के संयुक्त तत्वाधान में कृषक प्रषिक्षण का आयोजन किया गया। जल शक्ति अभियान के तहत जल संरक्षण हेतु जन चेतना एवं जागृति के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र मण्डला द्वारा केाविड-19 सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुये आॅनलाईन कृषक प्रषिक्षण जिले के कृषकों को प्रदान किया जा रहा है। यह प्रषिक्षण कार्यक्रम कृषि विज्ञान केन्द्र मण्डला के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डाॅ. विषाल मेश्राम के द्वारा जिले की ग्राम पंचायतों खापाकला, कोटासागवा, मडईजर, मलारीचक, माली मोहगांव, नांदिया, साल्हेडंडा, संकुही, सिलपुरा, मालधा, मछरिया, कारीकोन एवं मण्डला के 60 कृषकों को गर्मी की गहरी जुताई का महत्व एवं लाभ बताते हुये समझाईष दी गई कि वर्तमान समय अप्रैल से जून का गहरी जुताई हेतु उपयुक्त समय है। सामान्यता मानसून से पूर्व 9-10 इंच तक की गहराई में दो गहरी जुताई में उत्तम रहता है। इससे मृदा की उपरी कठोर परत टूट जाती है। तथा गहरी जुताई से वर्षा जल की मृदा में प्रवेष क्षमता व पारगम्यता बढ जाने से खेत में ही वर्षा जल का संरक्षण हो जाता है। परिणाम स्वरूप पौधों की जडो को कम प्रयास में मृदा जल की अधिक उपलब्धता प्राप्त होती है। मृदा की जल-षोषण व जल-धारण क्षमता बढने से सिंचाई व्यय में बचत होती है। तथा फसल का विकास भी अनुकूल होता है। क्रमिक रूप से शुष्क होने व ठण्डा होने के कारण मृदा की संरचना मे सुधार होता है। मृदा वायु संचार में सुधार होने से मृदा सूक्ष्म जीवों का बहुगुणन तीव्र गति से होता है। फलस्वरूप मृदा कार्बनिक पदार्थ का अवघटन तीव्र गति होने से अगली फसल को पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ जाती है। बहुत से हानिकारक जीवाणु उनके स्पोर, फफुंद तथा अन्य हानिकारण सूक्ष्य जीव गर्मी की तेज धूप में तपकर नष्ट हो जाते हैं फलस्वरूप अगली फसल में बीमारियों में कमी आने से कृषक को इनके प्रबंधन पर अतिरिक्त व्यय नही करना पडता है। बहुत से खरपतवार एवं कीट व्याधी भी सूर्य की तेज गर्मी से झूलस कर नष्ट हो जाते है अतः सभी किसान भाईयों को गर्मी की गहरी जुताई आवष्यक रूप से प्रत्येक 3 वर्षो में 1 बार करना चाहिए। इस प्रषिक्षण कार्यक्रम में केन्द्र के वैज्ञानिकों डाॅ. आर.पी. अहिरवार. डाॅ. प्रणय भारती श्री नीलकमल पन्द्रे, कु. केतकी धूमकेती एवं जिले के 60 कृषको ने भाग लिये।



