साहित्य दर्पण
अजब तमाशा

दुनिया है अजब तमाशा
खेल समझ नाता
कभी पैसा, कभी पावर
ऐसा डुगडुगी बजाता
आम आदमी सहम-सा जाता
सत्ता के सर्वोच्च शीर्ष पे बैठकर
नित नये-नये तमाशा
दिखाते है ये तमाशा बीन
जिसे देख-सुन कर
ठगे से रह जाते!
कभी धर्म के नाम पर
कभी रंग जाती के नाम पर
हर रोज नया तमाशा कर जाते
उनकी हर बाजीगरी
हम पर भारी पड़ जाती
दिन-ब-दिन
हमारी लाचारी बढ़ती जाती
उनकी मंशा परवान चढ़ती जाती!!
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