साहित्य दर्पण
में हार गया…

ग़म-ए-आशिक़ी में मारा गया।
अपने ही दिल से में हार गया।
अंजान दुनिया में कदम रखते
ही मैं अपना पता भूल गया।
इश्क़ में किसीको पाने की
तलब में ख़ुद प्यासा रह गया।
इतना दूर चला आया शब्दों के
सहारे किताबों में समा गया।
लोगों के सवालों नहीं ख़ामोशि
मेरी से लड़ते हुए में थक गया।
नीक मोहब्बत में तू चंद साँसों
के लिए मौत भी से हार गया।
नीक राजपूत
9898693535



