जीवन का पैग़ाम
सूरत नहीं सीरत बनाओ
मिट जायेगा नूर लाजिमी
सुंदर चेहरे का इक दिन
याद किरदार बस रह जाएगा
है जीवन का पैग़ाम सच्चा
प्रभु मिलन भी सम्भव तभी I
हर लम्हा इम्तहान है यहाँ
इन्सान की शख्सियत का
हक़ मान के रखा हुआ है
जिन सांसों पर अपनी सदा
लगाम उसकी थामी हुई है
रब ने सब अपने हाथ I
सच का दामन थामे रहो
है सत्य सनातन यही सर्वदा
फिर क्यूँ खाता है धोखा
अपने नातों से जग में
पराजित होता मानस अक्सर
जीवन में हाथों से इन्हीं के I
आज लगता है डर
अल्फाजों से खुद के
खामोशियों ही हैं अब बेहतर
रूह के पैग़ाम के लिए
है जीवन का मन्त्र सच्चा
प्रभु मिलन भी सम्भव तभी I
मुनीष भाटिया
585, स्वस्तिक विहार,
जीरकपुर (मोहाली), चंडीगढ़
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