साहित्य दर्पण

जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत तिन देख ही तैसी।

सभ्यता का विकास निरंतर होता रहता है किंतु, संस्कृति का विकास कभी कभार होता है ,जब कोई दिव्य पुरुष जन्म लेकर अपने ज्ञान, अपनी सेवा एवं अपने विचार एवं अपने ,प्रभाव के द्वारा हमारी सोच को बदल डालते हैं। हमारी जिंदगी को बदल डालते हैं ।ऐसे ही अन्यतम महापुरुष की श्रेणी में गोस्वामी तुलसीदास जी का स्थान अति विशिष्ट है । राम भक्त कवियों में सर्वश्रेष्ठ गोस्वामी तुलसीदास हिंदी के महाकवि हैं। हिंदू समाज में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो तुलसी नाम से परिचित ना हो । सार्वभौम काव्य प्रतिभा से संपन्न महाकवि तुलसीदास युगों युगों तक प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। तुलसीदास जी के द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस का पाठ एवं सुंदरकांड का पाठ आए दिन हिंदू परिवारों में होते रहते हैं ।मंदिरों में रामायण पाठ किया जाता है एवं ,बहुत श्रद्धा के साथ इसे हिंदू धर्म में मान्यता प्राप्त है।
सर्वप्रथम रामायण की रचना आदि कवि वाल्मीकि ने की थी ।उसके बाद अलग-अलग भाषाओं के लेखकों द्वारा रामायण की रचना की गई ।किंतु, जितनी सफलता रामचरितमानस को मिली उतनी अन्य किसी रामयण को नहीं मिली ।शायद इसलिए गोस्वामी तुलसीदास जी को आदिकवि बाल्मीकि का अवतार माना जाता है-
” कल कुटिल जीव निस्तारित बाल्मीकि तुलसी भयो”
तुलसीदास जी का जन्म 1543 एवं निर्धन 1643 इसमें में राजापुर बांदा उत्तर प्रदेश में हुआ था ।इनकी माता का नाम हुलसी और पिता का नाम आत्माराम दुबे था।कुण्डली दोष के कारण जन्म के साथ ही तुलसी की माता हुलसी का स्वर्गवास हो गया ,पिता ने तुलसी को मुनिया नाम की दासी को सौप दिया जिसने तुलसी की परवरिश की । तुलसी का बचपन बहुत कष्ट से बीता। जनश्रुति है कि, इनके मुख से सर्वप्रथम राम निकला था, जिस कारण उनका बचपन का नाम “रामबोला”था। रामबोला जब 5 वर्ष के थे ,उसी समय मुनिया भी दुनिया भी चल बसी। तब बालक तुलसी पर गुरू नरहरिदास की नजर पड़ी। उन्होंने तुलसी को संस्कारित कर नया जीवन दिया एवं इनका नाम तुलसीदास रखा और इन्हें काशी के विद्वान से शेष सनातन जी के घर काशी ,शिक्षा अध्ययन के लिए रखवाया । इन्ही के घर रहकर तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की रचना की थी।
तुलसीदास जी से शेष सनातन जी के गुरुकुल में युवा होकर पढ़ाया करते थे ,एवं ज्योतिषाचार्य का कार्य भी करते थे। यही पर उन्होंने सभी शास्त्रो का अध्ययन किया था। इनका विवाह रत्नावली विदुषी कन्या से हुआ था। शादी के बाद पहलीबार रत्नावली मायके गई।तुलसी यह वियोग सहन न कर सके ,रात में अंधेरे में उफनती नदी पार कर ,पत्नी से मिलने पहुंच गए ।रत्नावली को क्रोध आ गया और उसने कहा कि ,” चाम के शरीर के प्रति जो आसक्ति है ,वह आ सकती अगर आप ईश्वर सेवा में लगाए तो वह ज्यादा अच्छा होगा।”
रत्नावली के इस वाक्य से तुलसीदास के मन में वैराग्य जाग उठा, और वह साधु बन गए ।राम नाम की सेवा में लीन हो गए तुलसीदास जी ने राम लला नहीं, ,पार्वती मंगल ,बरवै रामायण, जानकी मंगल ,कवितावली ,गीतावली ,रामचरितमानस ,विनत पत्रिका की उन्होंने रचना की। उन्होंने अवधि और ब्रज दोनों भाषाओं में रचना हैं।,युगपुरुष तुलसीदास को उनकी जयंती पर शत शत ।

 

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