साहित्य दर्पण

कशमकश कैसी ये दोस्त

ख़्वाहिशों की राह में
कोई हमसफ़र नहीं बनता
इश्क की सियासत में
बदलते रहते हैं वो नकाब
किन्तु अलफाजो से उनके
अक्सर मिल ही जाता है
किरदार का हिसाब
अबतक मुश्किल से गुजरे हैं
जीवन के सफ़र सभी
हसीन करना है
लम्हा अब हर सांस का
जिन्दगी के लम्हों को
गर उम्मीद से जिया जाए
तो ही है बेहतर
बुझी चाहतों के चिराग से
रोशन सुबह है नामुमकिन
खताओं उसकी का अब
रखें हिसाब या
मोहब्बत का करें इजहार
ख़्वाहिशों की राह में
कशमकश कैसी ये दोस्त…

मुनीष भाटिया
585, स्वस्तिक विहार, ज़ीरकपुर
चंडीगढ़
9416457695

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