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बंदर डायमंड परियोजना स्थानीय लोगों को खटक रही, वो विकास है या विनाश

छतरपुर/बक्सवाहा। बंदर डायमंड ब्लॉक मध्य प्रदेश में छतरपुर जिले के बक्सवाहा तहसील में स्थित एक ग्रीनफील्ड खनन परियोजना है। लगभग पंद्रह साल पहले वर्ष 2005 से 2011 के दौरान इस क्षेत्र का पता लगाया गया था, और उसके बाद 2012 में दुनिया की दिग्गज खनन कंपनी रियो टिंटो को 954 हेक्टर क्षेत्र में माइनिंग लीज़ के लिए एलओआई प्रदान किया गया था। रियो टिंटो ने माइनिंग लीज़ को अमल में लाने के लिए आवश्यक अपेक्षित परियोजना अनुमोदन प्राप्त किए, जैसे कि, अगस्त 2013 में इंडियन ब्यूरो ऑफ़ माइन्स (आईबीएम) से खनन योजना अनुमोदन, 37वीं ईएसी बैठक (गैर-कोयला खनन क्षेत्र) के बाद अगस्त, 2015 में पर्यावरण मंजूरी। लेकिन, 2017 में रियो अपने परिसंपत्ति पोर्टफोलियो को सुव्यवस्थित करने के कारणों का हवाला देते हुए परियोजना से बाहर चली गयी, और परियोजना को मध्य प्रदेश सरकार को वापस सौंप दिया।

इस सन्दर्भ में एक बात जो स्थानीय लोगों को खटक रही है वो है विकास के मुद्दे से भटकाव की बातें। कुछ लोगों का पूछना है की जब रिओ यहाँ से चला गया और जब प्रोजेक्ट कैंसिल हो गया तब उन्हें और उनके विकास की बातें करने वाले काफी सिमित लोग ही थे। ऐसे समय में वैसे पर्यावरणविद जो अभी काफी सक्रिय हैं वो लोग कहाँ थे ? स्थानीय लोगों के बेहतर आर्थिक जीवन यापन के लिए बाहरी लोगों का साथ कहाँ है?
गौरतलब बात है की छतरपुर सामाजिक-आर्थिक रूप से एक चुनौतीपूर्ण जिला है। छतरपुर को मध्य प्रदेश के आकांक्षी जिलों में से एक के रूप में पहचाना गया है, और यह देश के 115 आकांक्षी जिलों की सूची में एक है। नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, छतरपुर जिले की प्रति व्यक्ति आय राज्य के औसत से लगभग 39 प्रतिशत और अखिल भारतीय औसत से 56 फीसदी कम है।

स्थानीय आबादी के लिए रोजगार के कुछ अवसरों के कारण बकस्वाहा क्षेत्र में बहुत सीमित औद्योगिक गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं। बंदर डायमंड ब्लॉक का कार्य शुरू होने पर इस क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक ढांचे पर सकारात्मक पड़ेगा। इस प्रोजेक्ट से जुटाए गए संसाधनों का मूल्य 55,000 करोड़ रुपए है और इस प्रोजेक्ट से सरकारी खजाने को कुल 28,000 करोड़ रुपए प्राप्त होने की उम्मीद है। इसीलिए स्थानीय ग्रामीणों ने सरकार की विकास परियोजनाओं और क्षेत्रीय विकास और औद्योगीकरण की पहल का गर्मजोशी से स्वागत किया है।

गौरतलब बात है की वर्ष 2019 में मध्य प्रदेश सरकार ने एमएमडीआर अधिनियम 2015, और खनिज नीलामी नियम 2015 के प्रावधानों के अनुसार एक पारदर्शी प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रक्रिया में ब्लॉक की नीलामी की लेकिन इस बार माइनिंग लीज का क्षेत्र काफी कम कर दिया (954 हेक्टर की जगह सिर्फ 364 हेक्टर)। नीलामी प्रक्रिया में पांच प्रमुख खनन कंपनियों ने भाग लिया। ब्लॉक को मध्य प्रदेश सरकार को 30.05% राजस्व हिस्सेदारी का उच्चतम बोली मूल्य मिला। 19 दिसंबर 2019 को उच्चतम बोली लगाने वाले को एलओआई जारी किया गया।

ऐसा माना जा रहा है की इस प्रोजेक्ट से हीरा आयात पर अंकुश लगेगी, जोकि ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक छोटा कदम साबित होगा। परियोजना को विकसित करने की पूंजीगत लागत लगभग 2500 करोड़ रुपये है जो छतरपुर जिला को विकसित करने में भी मदद करेगी। परियोजना से उत्पादित हीरों की नीलामी एलओआई की शर्तों के अनुसार सबसे पहले मध्य प्रदेश राज्य में की जाएगी। मध्य प्रदेश सरकार प्रदेश में हीरों के लिए एक नीलामी केंद्र की परिकल्पना बना रहा है, इस पहल से डायमंड कटिंग, पॉलिशिंग और हीरों के आभूषण बनाने जैसे मध्य और अनुप्रवाह हीरा उद्योग विकसित करने में मदद मिलेगी।

इस डायमंड प्रोजेक्ट से 1,000 से 1500 स्थानीय लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की उम्मीद है। इस परियोजना के माध्यम से रोजगार के अवसर बढ़ने से छतरपुर जिले में बाजारों को विकसित करने में मदद मिलेगी, जिससे सड़कों, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक बुनियादी ढांचे में समग्र सुधार होगा। इन सभी तथ्यों से एक बात तो साफ जाहिर है की स्थानीय लोगों को विकास चाहिए और बंदर हीरा परियोजिना इस दिशा में एक सकारात्मक पहल है |

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