मध्य प्रदेशसाहित्य दर्पण

शून्य कर दे मेरे अहम् मैया

है चारों ओर मेरे अहमों की भीड़
कहा आ गया हूं मैं कैसे धरुं धीर

है रहना यहीं हमें कहां हम जाएं
इनके बीच रहकर कैसे तुम्हें पाएं
मेरी ये समस्या है मां बहुत गंभीर
कहां आ गया हूं मैं कैसे धरुं धीर

बांटू प्रेम केवल कर दे रहम भैया
शून्य कर दे री मेरा अहम मैया
खींच दे अधर पर हंसी की लकीर
कहा आ गया हूं मैं कैसे धरुं धीर

अहमों से‌ नहीं है लड़ने की शक्ति
अशक्त रवि करे कैसे तेरी भक्ति
कैसी ओ मैया मैंने पाई तकदीर
कहां आ गया हूं मैं कैसे धरुं धीर

रवीन्द्र मक्कड़ रवि

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