कुछ पद चिह्नों पर चलते हैं कुछ खुद पद चिह्न बनाते हैंः श्रद्धेय सुभाष चन्द्र बैनर्जी

जबलपुर दर्पण। स्व. देवीचरण बैनर्जी एवं पंकजनी देवी के परिवार में आपका जन्म 14 अगस्त 1921 को संस्कारधानी जबलपुर में हुआ। आपकी स्नातक स्तर की शिक्षा- दोक्षा जबलपुर में संपन्न हुई। श्री एकनाथ रानाडे के सानिध्य में आप राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ेप्रचारक के रूप में आपने 10 वर्षों तक संघ के कार्य को छत्तीसगढ़ प्रान्त में विस्तार प्रदान किया।21 अक्टूबर 1951 में जनसंघ पार्टी को स्थापना के पश्चात् पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के मार्गदर्शन में आपने महाकौशल एवं जबलपुर प्रांत में जनसंघ को स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की एवं जनसंघ में आप प्रांतीय संचिव तत्पश्चात् महासचिव नियुक्त किये गये। इसके साथ ही आपने 10 वर्षों तक जिला व शहर जनसंघ में अध्यक्ष पद के दायित्व का निर्वहन किया।Q 1953 में पिता के निधन के पश्चात् आपने पारिवारिक दायित्व निर्वहन किया एवं जयश्री जी के साथ 02 जुलाई1956 में परिणय सूत्र में बंधे।
1967 में आपने जनसंघ पार्टी से लोकसभा प्रत्याशी के रूप में अपने प्रतिद्वंदी को कड़ी टक्कर दी।1972 में आपने अपने गलगला निवास की भूमि का एक हिस्सा दान देकर संस्कारधानी में प्रथम सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की। 0 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 में आपातकाल में मीसा के तहत आपको गिरफ्तार कर मध्यप्रदेश के विभिन्न जेलों में रखा गया।आपातकाल में आपके परिवार के 5 सदस्य जिसमें आपकी पनि श्रीमती जयश्री बैनर्जी, आपके सबसे बड़े भाई श्री विमलचंद्र बैनर्जी, छोटे भाई श्री विभाष चन्द्र बैनर्जी एवं उनके 02 पुत्र अरूण तथा विपिन को मीसा के तहत 19 माह के लिये जेल भेजा गया। © 1977 में जनता पार्टी से आपकी पत्नि श्रीमती जयश्री बैनर्जी ने चुनाव में विजयी होकर विधायक एवं मंत्री बनी एवं 1990 तथा 1993 में पुनः विधायक बनीं। इसके पश्चात् 1999 में जबलपुर लोकसभा से सांसद रहीं। 0 आपको देश की महान विभूतियाँ पं. दीनदयाल उपाध्याय, श्री एकनाथ रानाडे, श्री कुशाभाऊ ठाकरे, श्री दत्तोपंत ठेंगडी, श्री नानाजी देशमुख, श्री अटल बिहारी बाजपेयी एवं श्री लाल कृष्ण आडवाणी का सानिध्य, उनकी प्रशंसा आर्शीवाद एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। भारत रत्न स्व. श्री नानाजी देशमुख के शब्दों में “सुभाषचन्द्र बैनर्जी एक असमान्य स्वयंसेवक थे जिनके कौटुम्बिक जीवन में संघ ही संघ था।
माननीय पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने आपकी प्रशंसा करते हुये कहा था कि ‘सच कहूं तो सुभाष जी के बिना जबलपुर अधूरा है”।आपने कर्त्तव्यपथ पर अनवरत चलते हुए 15 नवम्बर 2000 को हम सबसे विदा हुये।



