अस्पताल की फर्श में मरीज का हो रहा उपचार

सीधी जबलपुर दर्पण । बरसात में मौसमी बीमारियों का कहर तेजी से बरपने लगा है। विभिन्न संक्रामक बीमारियों से पीडि़त मरीजों की भरमार होने से डाक्टरों के यहां मरीजों की लंबी लाइन नजर आ रही है। निजी अस्पतालों के साथ सरकारी अस्पतालों में मरीजों का दबाव काफी ज्यादा हो गया है। बारिश से हल्की ठंडक आने के बाद मौसम के बदलाव के चलते वायरल फीवर एवं पेट की बीमारियां पांव पसार रही है। जिसके चलते सैकड़ों की संख्या में मरीज डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं। खासतौर पर जिला अस्पताल के ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या 700 के ऊपर तक पहुंच गई है। जिसमें बुखार और वायरल के साथ-साथ पेट में इन्फेक्शन वाले मरीज ज्यादातर इलाज करानें के लिए पहुंच रहे हैं। जानकारी के अनुसार पहले जहां 5 सैकड़ा मरीज मेडिसिन की ओपीडी में पहुंचा करते थे अब उनकी संख्या भी बढकर 7 सैकड़ा से ऊपर पहुंच चुकी है। जिला अस्पताल के मेडिकल वार्डों में बेड न होने से फर्श में भर्ती कर मरीजों का उपचार किया जा रहा है। चर्चा के दौरान कुछ चिकित्सकों का कहना था कि बदलते मौसम को देखते हुए बाहर के खान-पान के कारण ही लोगों में वायरल फीवर के साथ-साथ पेट में इन्फेक्शन जैसी बीमारी सामने आ रही है। ऐसे में कुछ दिनों तक लोगों को बाहर के खान-पान से परहेज करना चाहिए। जिससे बीमारी का खतरा न रहे। अब हालात सीधी जिले में ऐसे बन रहे हैं कि बारिश के बाद डेगू का खतरा भी बढ़ रहा है। बरसात का दौर चल रहा है ऐसे में अपने घरों के आसपास पानी का जमाव न होने दें। घर के बाहर मौजूद ऐसी सामग्री जिसमें बरसात के पानी का जमाव होता है उसको नष्ट कर दें अन्यथा इसी जमे पानी में डेगू मच्छर के लार्वा तेजी से पनपेंगे और बुखार के मरीजों को डेगू का खतरा भी बढ़ जाएगा। जिले में बदलते मौसम के चलते वायरल फीवर का प्रकोप लगातार बरप रहा है। स्थिति यह है कि हर दूसरा व्यक्ति सर्दी, जुखाम, बुखार से पीडि़त है। जिन व्यक्तियों की रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति मजबूत है वह तो बदलते मौसम को झेल लेते हैं। वहीं जो व्यक्ति शारीरिक रूप से इतना मजबूत नहीं होता वह वायरल फीवर की प्रकोप में आसानी से आ जाता है। घर में एक व्यक्ति के वायरल फीवर से पीडि़त होने के बाद अन्य सदस्य भी इसकी चपेट में आसानी से आ जाते हैं। स्थिति यह है कि शासकीय अस्पतालों में आम व्यक्ति के बीमार होने के बाद सही उपचार सुविधा नहीं मिल पाती। लिहाजा उन्हे प्रायवेट चिकित्सा का सहारा लेना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो झोलाछाप डाक्टरों से इलाज कराने के लिए मरीज मजबूर हो चुके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित स्वास्थ्य केन्द्रों के खुलने के बाद भी उनमें प्राथमिक चिकित्सा तक की सुविधा नहीं मिल पाती। कई स्वास्थ्य केन्द्रों में डाक्टर नहीं हैं तो कुछ में कम्पाउंडर एवं एएनएम के सहारे ही उपचार की व्यवस्था बनाई गई है। यहां के स्वास्थ्य केन्द्रों में जाने पर सभी मर्जों के लिए एक ही दवा देने की व्यवस्था लागू है। उक्त दवा से मरीजों को कोई राहत न मिलने पर वह झोलाछाप डाक्टरों से ही प्राथमिक उपचार कराते हैं। यदि राहत नहीं मिली तो उन्हे शहर की ओर उपचार कराने के लिए आना पड़ता है।
शासकीय डॉक्टर बंगले में मरीजों को देखने में व्यस्त
जिला अस्पताल एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ डॉक्टरों की स्थिति यह है कि वह ओपीडी में काफी कम समय देते हैं। ओपीडी में औपचारिकता निभाने के बाद ऐसे डॉक्टर मरीजों को देखने के लिए अपने बंगले में पहुंच जाते हैं। डॉक्टर अपने बगले में ही मरीज का सही उपचार सुनिश्चित करते हैं। अब यह प्रचलन बढ़ गया है कि शासकीय डॉक्टर भी अपने खास पैथालॉजी सेंटर से जांच कराने के लिए भेजते हैं। यदि उनसे संबंधित सेंटर से पैथालॉजी जांच न कराई जाए तो उसे मान्य भी नहीं किया जाता। इसी तरह डॉक्टरों द्वारा अपने संबंधित मेडिकल स्टोरो से दवाओं के लिए भी भेजा जाता है। जितने डॉक्टर हैं उनकी पसंद भी दवाओं को लेकर अलग-अलग होने से पर्ची में लिखी दवाएं अन्य मेडिकल स्टोरों से मिलने में भी दिक्कतें बनी हैं। उधर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं उप स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत यह है कि यहां पदस्थ स्वास्थ्य कर्मी ही नदारत रहते हैं। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टर नहीं हैं और जहां पदस्थ भी हैं वह मनमौजी ड्यूटी कर रहे हैं।



