दशलक्षण धर्म ही संयमित जीवन जीने का आधार


आलेख – आशीष जैन (जबलपुर दर्पण)
जैन धर्म दिगम्बर सम्प्रदाय के अनुयायियों द्वारा आदर्श अवस्था में अपनाये जाने वाले गुणों को दशलक्षण धर्म या पर्वराज पर्यूषण पर्व भी कहा जाता है। जीवन में सुख, समृद्धि और शांति के लिए उत्तम क्षर्मा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, अकिंचन और ब्रह्मचर्य आदि दशलक्षण धर्मों का पालन हर मनुष्य को करना चाहिए। प्राचीन जैन ग्रन्थ तत्त्वार्थ सूत्र में दस धर्मों का विस्तृत विवरण वर्णित है। दसलक्षण पर्व में इन दस धर्मों को धारण किया जाता है। उत्तम क्षमा भाद्रमाह के चतुर्थी से दिगंबर जैन समाज के दसलक्षण पर्व शुरू होते है। यह दिन भगवान गणेश की जयंती विनायकी चतुर्थी के रूप में भी जाना जाता है और देश भर में गणेश प्रतिमाएं स्थापित की जाती है। इस दिन हम एक- इन्द्रिय से पांच- इन्द्रिय जीवों के साथ साथ हर व्यक्ति से क्षमा मांगते हैं जिसके साथ हमने अच्छा व्यवहार नहीं किया। उत्तम क्षमा धर्म हमारी आत्मा को सही राह खोजने में और क्षमा को जीवन और व्यवहार में लाना सिखाता है। उत्तम मार्दव पर्वाधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का दूसरा दिन होता है। धन, दौलत, शान और शौकत इन्सान को अहंकारी और अभिमानी बना देता है, ऐसा व्यक्ति दूसरों को छोटा और अपने आप को सर्वोच्च समझने लगता। ये सभी चीजें नाशवान हैं। ये एक दिन आप को छोड देंगी या फिर आपको एक दिन मजबूरन इन चीजों को छोडना ही पडेगा। उत्तम आर्जव धर्म तीसरा दिन हम सब को सरल स्वभाव रखना चाहिए, बने उतना कपट को त्याग करना सिखाता है। मोह-माया, बुरे काम सब छोड कर सरल स्वभाव के साथ परम आनंद मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। उत्तम शौच चौथा धर्म किसी चीज़ की इच्छा होना इस बात का प्रतीक है कि हमारे पास वह चीज नहीं है। तो हमारे पास जो कुछ है, उसके लिए परमात्मा का शुक्रिया अदा करें और संतोषी बनकर उसी में काम चलायें। भौतिक संसाधनों और धन- दौलत में खुशी खोजना यह महज आत्मा का एक भ्रम है। शुद्ध मन से जितना आपको मिला है, उसी में खुश रहो,प्रभु का हमेशा शुक्रिया मानों और अपनी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करो।
उत्तम सत्य पाँचवाँ दिवस हमें सिखाता है, आत्मा की प्रकृति जानने के लिए सत्य आवश्यक है और इसके आधार पर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करना मुमकिन है। अपने मन आत्मा को सरल और शुद्ध बना लें तो सत्य अपने आप ही आ जाएगा। उत्तम संयम छठा दिवस धूप दशमी के रूप में मनाया जाता है लोग घर से धूप लेकर जाते हैं और मंदिर में भगवान के दर्शन के साथ धूप चढा कर खूशबू फैलाते हैं और कामना करते हैं कि इस धूप की तरह ही हमारा जीवन भी हमेशा महकता रहे। पसंद नापसंद ग़ुस्से का त्याग करना। इन सब से छुटकारा तब ही मुमकिन है जब अपनी आत्मा को इन सब प्रलोभनों से मुक्त करें और स्थिर मन के साथ संयम रखें। इसी राह पर चलते परम आनंद मोक्ष की प्राप्ति मुमकिन है। उत्तम तप का मतलब सिर्फ उपवास में भोजन नहीं करना, नहीं, बल्कि तप का असली मतलब है कि इन सभी क्रिया-कलापों के साथ अपनी इच्छाओं और ख्वाहिशों को वश में रखना, ऐसा तप अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करता है। पहले तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने करीब छह महीनों तक ऐसी तप-साधना बिना खाए बिना पिए की थी और मोक्ष को प्राप्त किया था।तीर्थंकरों जैसी तप-साधना करना इस काल में शायद सम्भव नहीं है, पर हम भी ऐसी ही भावना रखते हैं, इस दौरान उपवास बिना खाए बिना पिए, एकाशन एकबार खाना-पानी करतें हैं और परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करने की भगवान से प्रार्थना करते है। उत्तम त्याग आठवाँ दिन होता है, त्याग शब्द से ही पता लग जाता है कि इसका मतलब छोडना है और जीवन को संतुष्ट बना कर अपनी इच्छाओं को वश में करना है। छोडने की भावना जैन धर्म में सबसे अधिक है, क्योंकि जैन-संत सिफॅ अपना घर-बार ही नहीं, बल्कि अपने कपडे भी त्याग देता है और पूरा जीवन दिगंबर मुद्रा धारण करके व्यतीत करता है। इन्सान की शक्ति इससे नहीं परखी जाती है कि वह कितना त्याग कर सकता है।
उत्तम आकिंचन्य नौवाँ दिन होता है हमें मोह को त्याग करना सिखाता है। जमीन, घर, चाँदी, सोना, धन, अन्न, महिला नौकर, पुरुष नौकर, कपडो के साथ आत्मा के भीतरी मोह, गलत मान्यता, गुस्सा, घमंड, कपट, लालच, मजाक, पसंद-नापसंद, डर, शोक, और वासना इन सब मोह का त्याग करना है। सभी मोह, प्रलोभनों और परिग्रहों को छोडकर ही मोक्ष को प्राप्त कर सकते है। उत्तम ब्रह्मचर्य पवाॅधिराज पर्यूषण दसलक्षण पर्व का दसवाँ एवं अंतिम दिन होता है। इस दिन को अनंत चतुर्दशी भी कहते है। इस दिन भगवान गणेश की प्रतिमाओं का भी विसर्जन भी किया जाता है। उन परिग्रहों का त्याग करना, जो हमारे भौतिक संपर्क से जुडी हुई हैं। जैसे जमीन पर सोना, जरुरत से ज्यादा किसी वस्तु का उपयोग न करना, व्यय, मोह, वासना ना रखते हुए सादगी से जीवन व्यतीत करना। जैन मुनि और आर्यका मन वचन और काय से सबसे ज्यादा इसका ही पालन करते हैं।
अनंत चतुर्दशी के दूसरे दिन क्षमावाणी पर्व मनाते हैं। मंदिर में सभी लोग एक साथ प्रतिक्रमण करते हुए पूरे साल मे किये गए पाप और कटु वचन से किसी के दिल को जाने-अनजाने ठेस पहुंची हो, तो उसके लिए एक-दूसरे को क्षमा करते हैं, और एक-दूसरे से क्षमा माँगते है। हाथ जोड कर गले मिलकर उत्तम क्षमा कहते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए 10 लक्षण पर्यूषण पर्व जैन धर्म एवं संप्रदाय में संयमित जीवन जीने का आधार स्तंभ है, और क्षमावाणी शिखर। सबसे क्षमा, सबको क्षमा यही है उत्तम क्षमा, जय जिनेंद्र।



