इंदौर दर्पण

बाल मन के बदलाव और कारण पर ध्यान केंद्रित करना होगा हमें-डॉ. दवे

इंदौर जबलपुर दर्पण । बाल मन का बदलना है तो इसे हम आरोप की तरह क्यों लेते हैं, क्या हम इसे उपहार की तरह नहीं ले सकते ? अगर बाल मन नहीं बदलेगा, तो क्या हम बदलेंगे ? हाँ, चिंतन का विषय यह है कि जिस गति से आज के बच्चों का मन बदल रहा है, उस परिवर्तन की गति से क्या हम स्वयं को परिवर्तित कर पा रहे हैं ? असल मायने में बाल मन के बदलाव का कारण तकनीकी हस्तक्षेप एवं सामाजिक परिदृश्य है। तो हमें इस बदलाव पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
बाल साहित्य शोध सृजन पीठ, (साहित्य अकादमी, संस्कृति परिषद, मध्यप्रदेश शासन) द्वारा रविवार को इंदौर में ‘बदलता बाल मन एवं बाल साहित्य की भूमिका’ विषय पर आयोजित परिचर्चा एवं काव्यपाठ में यह महती विचार साहित्य अकादमी मप्र के निदेशक डॉ. विकास दवे ने व्यक्त किए।
सरजू प्रसाद पुस्तकालय (भारती भवन) श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इंदौर में इसका शुभारंभ वाणी जोशी की सरस्वती वंदना से हुआ। प्रथम सत्र में परिचर्चा में डॉ. दवे, गोपाल माहेश्वरी (वरिष्ठ बाल साहित्यकार), डॉ. मीनू पांडे (निदेशक-सृजनपीठ, भोपाल), वरिष्ठ लघुकथाकार मीरा जैन, इंदु पाराशर एवं आशु कवि प्रदीप ‘नवीन’ मंचासीन रहे। स्वागत उद्बोधन डॉ. पांडे ने दिया।
परिचर्चा संयोजक गोपाल माहेश्वरी ने कहा कि बालमन अति चंचल होता है। बाल मन गलती करता है, तभी तो वह सीखता है और इसी में बाल साहित्य की सार्थकता है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम किस प्रकार की रचना बच्चों को परोस रहे हैं।
विषय प्रवर्तन देवेंद्र सिंह सिसौदिया ने किया। प्रथम सत्र का कुशल संचालन लेखक मुकेश तिवारी ने किया। चर्चाकार के रूप में डॉ. गरिमा दुबे रहीं।

🔹अनेक रचनाओं से उकेरा बाल मन
द्वितीय सत्र में ‘बदलता बाल मन
एवं बाल साहित्य की भूमिका’
विषय पर श्री माहेश्वरी, मनीषा बनर्जी, नयन कुमार राठी, डॉ. रेखा मंडलोई, वरिष्ठ पत्रकार एवं हिन्दीभाषाडॉट कॉम के सम्पादक अजय जैन ‘विकल्प’, सपना साहू ‘स्वप्निल’, शीला बड़ोदिया, सुनीता श्रीवास्तव और दामिनी ठाकुर आदि ने काव्य पाठ किया। मीरा जैन, इंदु पाराशर एवं पदमा सिंह ने भी विषय पर विचार प्रस्तुत किए।
इस सत्र का संचालन वाणी जोशी ने किया। आभार निदेशक डॉ. पांडे ने माना।

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