जबलपुर दर्पण

आपराधिक केस लटकाने का पैंतरा फ्लॉप! कोर्ट ने खारिज की केस ट्रांसफर की याचिका

जबलपुर दर्पण । में चर्चित आपराधिक मामले में कोर्ट ने आरोपी राजेश कुमार अवस्थी की उस मांग को खारिज कर जल्दी निर्णय से बचने के रास्ते को बंद कर दिया, जिसमें उसने अपने खिलाफ चल रहे केस की कार्यवाही में देरी करने के लिए उसे दूसरे न्यायालय में ट्रांसफर करने की गुहार लगाई थी।
क्या है पूरा मामला? जबलपुर के दीक्षितपुरा के रहने वाले राजेश कुमार अवस्थी के खिलाफ पुलिस थाना माढ़ोताल में धोखाधड़ी और जालसाजी का मुकदमा न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में चल रहा था। आपराधिक मामले में जब शिकंजा कसने लगा तो खुद को जल्दी से फंसता देख आरोपी राजेश ने सत्र न्यायालय में एक झूठी अर्जी लगाई कि जज की पहचान शिकायतकर्ता पक्ष से है, वे पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं। इसलिए उन्हें निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है। लिहाजा इस केस को किसी दूसरे जज के पास ट्रांसफर कर दिया जाए। मामला उस समय और गरमा गया जब आरोपी पक्ष ने कोर्ट द्वारा बीएनएनएस की धारा 107 की कार्रवाई शुरू किए जाने को भी पूर्वाग्रह का उदाहरण बताया। अवस्थी के वकील की दलील थी कि जज साहब ने बिना किसी आवेदन के स्वतः संज्ञान लेकर आरोपी राजेश अवस्थी, उसकी बहन रश्मि अवस्थी और मां गीता अवस्थी के बैंक खाते सील करने का आदेश जारी किया था जिस पर शिकायतकर्ता पक्ष सुभाष चंद्र केसरवानी के वकील आदर्श सिंह चौहान ने पलटवार करते हुए अदालत में तर्क दिया कि धारा 107 में प्रावधान है कि यदि अदालत को विश्वास हो कि संपत्ति अपराध की आय (proceeds of crime) है तो वह बिना किसी आवेदन के प्रभावित व्यक्ति को 14 दिनों के भीतर संपत्ति कुर्क करने के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस जारी कर सकता है और उस व्यक्ति के उपस्थित न होने पर न्यायालय एकतरफा आदेश पारित कर सकता है। यदि न्यायालय को लगता है कि नोटिस भेजने से कुर्की का उद्देश्य विफल हो जाएगा, तो वह बिना नोटिस दिए सीधे अंतरिम कुर्की या जब्ती का एकतरफा आदेश भी पारित कर सकता है। उन्होंने आगे कहा कि आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट तक सिविल केस हारने के बाद भी विवादित संपत्ति अवैध रूप से बेची है।आरोपी जानबूझकर केस की कार्यवाही लटकाने के लिए यह आवेदन लेकर आया है। पक्षकारों ने यह आरोप भी लगाया कि आरोपी ने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की। अतः जज बदलने की अर्जी भारी जुर्माने के साथ खारिज की जानी चाहिए।
जब सत्र न्यायालय ने न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री डी.पी. सूत्रकार से इस संबंध में टीप मांगी, तो उन्होंने आरोपी के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे पूर्णतः असत्य और आधारहीन बताया।
कोर्ट ने कहा- मनगढ़ंत आरोपों पर नहीं बदलेंगे जज!
हालांकि अदालत ने पूर्वाग्रह की दलीलों को पर्याप्त नहीं माना। सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि आवेदक की ओर से व्यक्त की गई आशंका कि उन्हें पीठासीन अधिकारी से न्याय प्राप्त नहीं हो पायेगा, पूर्णतः काल्पनिक एवं आधारहीन है। केवल कल्पनाओं और आशंकाओं के आधार पर केस ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। इसके लिए न्याय की विफलता की युक्तियुक्त आशंका विद्यमान होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है और ट्रांसफर आदेश “रूटीन में नहीं दिए जा सकते।
कोर्ट सख्त: कानूनी आदेशों से नाराज होकर जज बदलने की मांग करना पूरी तरह गलत!
सत्र न्यायाधीश कृष्णमूर्ति मिश्र ने फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के ‘उस्मान गनी अदमभाई वहोरा बनाम गुजरात राज्य (2016)’ मामले का विशेष जिक्र किया । कोर्ट ने साफ कहा कि न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी सिर्फ मनगढ़ंत आशंका जताकर जज बदलने की मांग करने लगे। कोर्ट के कानूनी आदेशों से नाराज होकर केस ट्रांसफर की मांग करना पूरी तरह गलत है ।
अंततः सत्र न्यायालय ने आरोपी राजेश अवस्थी की सारहीन अर्जी अंतर्गत धारा 448 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि मामले को दूसरे न्यायालय में भेजने का कोई ठोस आधार मौजूद नहीं है। कोर्ट के द्वारा ट्रांसफरअर्जी खारिज करने के चलते धोखाधड़ी के क्रिमिनल केस में जल्दी फैसला टालने की अवस्थी की कोशिश नाकाम हो गई। जिससे अब उसी अदालत में धोखाधड़ी और जालसाजी के इस आपराधिक मुकदमे की सुनवाई तेजी से आगे बढ़ेगी।

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