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वन्यजीव और मनुष्य के सह-अस्तित्व का केंद्र कारोपानी से गायब है सैकड़ों दुर्लभ हिरणें

डिंडोरी, जबलपुर दर्पण ब्यूरो। डिंडोरी जिले के कारोपानी गांव स्थित कृष्ण मृग विचरण क्षेत्र से अब सैकड़ों नर और मादा हिरणें गायब हो गए हैं। वन्यजीव और इंसानों के सह-अस्तित्व का केंद्र कहा जाने वाला कारोपानी अब कागजों के फाइलों में ही विचरण करती हुई दिखाई दे रही है। हम बात कर रहे हैं जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर एनएच 22 से 4 किलोमीटर दूर सहायक वन मंडल डिंडोरी अंतर्गत वन परिक्षेत्र उत्तर समनापुर के कारोपानी गांव की है, जहां कुछ वर्षों तक वन्यजीव और इंसानों के बिच बेहतर ताल-मेल का उदाहरण दिया जाता था। लेकिन इन दिनों बदहाली का शिकार कृष्ण मृग विचरण क्षेत्र से सेकंडों दुर्लभ हिरणें धीरे-धीरे अब गायब होने लगे है, जबकि इन दुर्लभ हिरणों को बचाने के लिए लाखों करोड़ का खर्चा जारी है। विचरण केंद्र के जाता हालत यह है कि अब हिरणों के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई जिम्मेदार विभाग लड़ रहा है। इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय लोग अब सवाल उठा रहे हैं कि वाहन धीरे चालाने की साइन बोर्ड से इन दुर्लभ हिरणों की प्रजातियां नहीं बढ़ेगी, इन दुर्लभ हिरणों को बचाने के लिए कोई ठोस और जरूरी कदम उठाए जाएं। मामले को लेकर जिम्मेदार अधिकारी भी कोई ठोस और सार्थक जवाब न देकर मामले की गंभीरता को नहीं समझ रहे, अपनी कार्यों के निर्वहन करने में जिम्मेदार विभाग के कर्मचारी कहीं ना कहीं बड़ी लापरवाही कर रहा है। यही कारण है कि वन्यजीव कृष्ण मृग विचरण क्षेत्र से बीते कुछ सालों में इन दुर्लभ हिरणों की प्रजातियां काम हो गई है।

झुंड में विचरण करते दिखाई देती थी हिरणों की दुर्लभ प्रजातियां।

बताया गया कि वर्षों पहले कारोपानी कृष्ण मृग विचरण क्षेत्र काले हिरण और धब्बेदार हिरणों की दुर्लभ प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध था, वर्षों तक यहां मनुष्य और वन्य-जीवों के बीच सह-अस्तित्व का एक अनूठा उदाहरण माना जाता था। स्थानीय लोगों ने बताया कि वर्षों पहले हिरणें खुले मैदानों और पहाड़ियों पर बिना किसी डर के स्वच्छंद विचरण करते हुए दिखाई दिया करते थे। लेकिन समय गुजारने के साथ ही इन दुर्लभ हिरणों की प्रजातियां काम हो गई है, यही कारण रहा होगा कि इन वन्य जीवों को उनके अनुरूप उन्हें माहौल नहीं मिल रहा, जिस कारण कुछ दुर्लभ हिरणें आसपास के जंगलों में चली गई और कुछ हिरणों के लिए इंसान ही उनके मौत के सौदागर बने। कारोपानी कृष्ण मृग विचरण क्षेत्र से होकर ही जबलपुर-अमरकंटक हाइवे गुजरती है, जहां नेशनल हाईवे के मुख्य मार्ग पर किसी भी प्रकार के सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम इन वन्यजीवों के लिए नहीं की गई है। हिरणों के विचरण के दौरान मुख्य मार्गो में आने से भी दुर्घटना के शिकार में अब तक सैकड़ो हिरणों की जानें जा चुकी हैं। प्रशासनिक आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2024 में जिम्मेदार विभाग ने 175 मादा हिरण और 96 नर हिरण बताकर हिरणों की संख्या सार्वजनिक किया गया था। लेकिन अब यह आंकड़ा कहां तक पहुंच गया यह शोध करने का चिंतनीय और गंभीर विषय है। समय रहते अगर इन दुर्लभ प्रजातियों के हिरणों के संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में इन दुर्लभ हीरोइन की अस्तित्व पर खतरा बन जाएगा। अब जिला प्रशासन को चाहिए कि पर्यटन क्षेत्र कहा जाने वाला कारोपानी में लाखों करोड़ों के खर्चे के बाद दुर्लभ हिरणों की प्रजातियां को संरक्षित करने के कितने उपाय किए जा रहे, इस पूरे मामले को लेकर मौके का निरीक्षण कराकर तत्काल इसकी सूक्ष्मता से जांच करवाएं।

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