बैंक सर्वर डाउन से परेशान ग्राहक

आलेख :- आशीष जैन (सह संपादक)
सरवर डाउन और बैंकों में कटने वाले विभिन्न प्रकार के चार्जेस एवं पेनल्टी का नाम सुनते ही दिमाग में अलग प्रकार की हलचल बेचैनी होने लगती है। मोबाइल मे एक बैंक मैसेज प्राप्त होता है, और पता चलता है कि इतने-इतने पैसे डेबिट हो गए। दिमाग में यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अब यह किस चीज का पैसा काट लिया। हैरान-परेशान व्यक्ति अपना समय निकाल कर बैंक में जाता है पासबुक दिखाकर एंट्री कराने की कोशिश करता है। और जवाब आता है प्रिंटर नहीं चल रहा। ऑटोमेटिक मशीन में प्रिंट करालो। बैंक में मशीन ढूंढता है मशीन खराब मिलती है। अपनी शिकायत दूसरे कर्मचारी को बताता है, दूसरा कर्मचारी घूरते हुए वे-मन से उसका अकाउंट नंबर कंप्यूटर में डालने की कोशिश करता है और जवाब आता है कि सर्वर डाउन है। लंच के बाद आना। और यह हम सब को अच्छे से पता है जो काम एक बार टल जाता है वह टल का ही जाता है। अब ग्राहक क्या करें उसके पास विकल्प नहीं है क्योंकि सभी बैंकों में यही हाल है। कितना भी महत्वपूर्ण कार्य आपको हो पर बैंक में बैठे छोटे या बड़े कर्मचारी अधिकारी ने अगर यह कह दिया सर्वर डाउन है तो आपके कार्य एवं समय का कोई महत्व नहीं बचता।
अक्सर देखने में मिलता है है कि जब अधिकारी कर्मचारी को कुछ समय के लिए कुछ काम करने की इच्छा ना हो या फिर किसी ग्राहक को अनावश्यक रूप से अगर परेशान करना हो तो यह बहाने के रूप में भी कार्य करता है। बहुत ही किस्मत वाला व्यक्ति होगा जो किसी महत्वपूर्ण कार्य से बैंक गया हो और उसका काम एक बार में ही हो गया हो। नहीं तो कभी सर्वर डाउन, नेटवर्क फेल, कनेक्टिविटी नहीं है,लॉग इन नहीं हो रहा, आवेदन लगा दो, आवेदन के साथ आधार कार्ड नहीं लगाया, पैन कार्ड नही है, यह सब चीजें अगर किस्मत से आपके मोबाइल में हैं तो उनको हार्ड कॉपी अर्थात फोटो कॉपी भी चाहिए। जब व्यक्ति का अकाउंट खुलता है तो सभी चीजें हैं बैंक में जमा एवं वेरीफाई कराने के उपरांत बड़ी ही मशक्कत और दो-चार दिन के प्रयासों से ही उस व्यक्ति का अकाउंट खुल पाता है। पर हर बात में जैसे पैसे निकालना हो, जमा करना हो, एफडी बनवाना हो या अन्य बैंक ट्रांजैक्शन से संबंधित किसी भी कार्य के लिए बैंक और बैंक कर्मचारी आपसे आवेदन के साथ फोटो कॉपी कब मांग ले कोई गारंटी नहीं है।
एक ही बैंक के अलग-अलग शाखाओं मैं अलग-अलग कर्मचारी अधिकारियों के पास अलग-अलग नियम होते ही हैं और मजाल है किसी एक कर्मचारी के द्वारा कही गई बात उसका साथी अधिकारी गलत होने पर भी गलत नहीं मानता। दोष या गलती सिर्फ ग्राहक का ही होता है। बैंक में अकाउंट खोलने वाला ग्राहक अपने ही पैसे जमा या निकालने के लिए घंटों लाइन में प्रतीक्षा करता है और उसकी किस्मत खराब होने के बाद सिर्फ एक शब्द सुनाई देता है सरवर नहीं है नेटवर्क फेल उसकी सारी मनोकामनाएं उसी समय ध्वस्त हो जाती हैं, और वह अपने आप में ठगा सा महसूस करने लगता है। पर वह बेचारा कुछ नहीं कर सकता क्योंकि यह समस्या संपूर्ण बैंकों में एक समान रूप से लागू होती है।
लंच टाइम, सर्वर डाउन, नेटवर्क फेल, आज स्टाफ नहीं है, ड्राफ्ट बनने में टाइम लगेगा, चेक जिसने दिया है उसे बुलाकर लाओ, अकाउंट खोल गया है कल आकर अकाउंट नंबर ले जाना, पासबुक नही है कल आना, चैकवुक एवं एटीएम15 दिन बाद आएगी घर में आएगी, एटीएम में पैसे फंस गए हैं तो 5 दिन बाद आएंगे, आवेदन देदो, खाता किसका है,किस के नाम पर है, कहां अकाउंट है, आधार कार्ड नहीं लगाया, पैन नंबर नही है, लंच के बाद आना, बस आप ही का काम करने थोड़ी बैठे हैं, ऐसे ना जाने कितने बहाने होते हैं जिसको बैंक का हर ग्राहक ना चाह कर भी झेलता, सुनता और सहन करता रहता है। अगर किसी कारण से किसी बैंक कर्मचारी या अधिकारी से वाद विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो सारा का सारा दोष ग्राहक का ही माना जाएगा और इसके खिलाफ थाने में शिकायतें भी दर्ज हो सकती है।
अगर आसान और सरल शब्दों में कहा जाए तो बैंक में हर काम के लिए अब शुल्क निर्धारित कर दिए गए हैं चाहे आपको एटीएम एसएमएस अलर्ट, चेक बुक, बैंक स्टेटमेंट, निर्धारित राशि से अधिक जमा या निकासी करना, निर्धारित जमा या निकासी से ज्यादा वार जमा या निकासी करना, डीडी, बैंर्कस चेक बनवाना, पासबुक गुम जाने पर दुबारा पासबुक बनवाना, एटीएम गुम जाने पर दोबारा एटीएम बनवाना, इन सबके अलावा अगर आप परेशान होकर बैंक अकाउंट बंद भी करवाते हैं तो उसका भी अच्छा खासा बैंक को चार्ज देना पड़ता है। और विरोध करने पर आप की सुनवाई तो होगी पर कार्यवाही कुछ नहीं होगी। बैंक कर्मचारी या अधिकारी ने बता कुछ चार्ज है या पेनाल्टी बता दी है तो वह कटना अनिवार्य है ज्यादा बातचीत बहस करने पर सिर्फ एक जवाब सामने आता है क्या आपने अकाउंट खुलवा ते समय सारे नियम कानून नही पड़े। जो आवेदन फॉर्म में 20 25 हस्ताक्षर होते हैं क्या आपने वह पड़े अगर वह पड़े होते तो आप हमसे बहस नहीं करते, यह ग्राहक से कह दिया जाता है कि मेरे घर में बनाए नियम नहीं है यह नियम आरबीआई बनाता है। और जो यह पैसा कट रहा है वह मेरे जेब में नहीं जा रहा।
टेक्निकल एक्सपर्ट से बैंक सर्वर डाउन के संदर्भ में जानकारी प्राप्त की तो उन्होंने बताया कि कभी भी बैंकों का सर्वर डाउन नहीं होता। पंचानवे परसेंट कंडीशन में उस पर्टिकुलर क्षेत्र में कनेक्टिविटी प्रॉब्लम या टेक्निकल फाल्ट आ सकता है जिसको आम बोलचाल की भाषा में बैंक कर्मचारी सर्वर डाउन का साइन बोर्ड लगा कर प्रदर्शित करते हैं। क्योंकि एक बार सर्वर डाउन हो जाने पर उस वित्तीय संस्था को करोड़ों के ट्रांजैक्शन का नुकसान होता है। अक्सर यह देखने में पाया गया है कि जितने भी गवर्नमेंट बैंक के होती हैं उनमें इस प्रकार सर्वर डाउन नेटवर्क कनेक्टिविटी फेल की समस्या होती ही है, जबकि प्राइवेट बैंकों में इस प्रकार की समस्या बहुत कम देखने को मिलती है। क्योंकि वह प्राइवेट बैंक,प्राइवेट सर्विस प्रोवाइडर से प्राथमिक व द्वितीय विकल्प लेकर चलता है जिससे उस बैंक मैं सर्वर डाउन नेटवर्क फेल एवं कनेक्टिविटी जैसी समस्या कभी नहीं होती। बैंक का हर कर्मचारी तकनीकी जानकार नहीं होता वह हर छोटी समस्या के लिए बैंक द्वारा उपलब्ध कराए गए टेक्निकल टीम की मदद लेता है वह मदद आने में भी समय लगता है और छोटी सी समस्या से भी घंटों का काम प्रभावित होता है। सरकारी बैंक इन चीजों पर ध्यान देना चाहिए, जिसका आम जनता और नागरिकों को अपना कीमती समय देकर खामियाजा ना चुकाना पड़े। इन सारी दिक्कतों उलझनो के बावजूद भी अगर बैंक कर्मचारी और अधिकारी सभ्यता और सलीके से बात ना करें और जानकारी ना दें तो ऐसे में सारी बैंकिंग व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगता ही जाता है



