वर्तमान परिदृश्य में शिक्षा व शिक्षको का सम्मान

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है । डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 1888 में तिरुट्टनी में हुआ था। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सबसे पहले एक शिक्षक थे उसके बाद राजनेता थे।उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष शिक्षा को दिए। उनकी उपलब्धियों को याद करना और उनकी उपलब्धियों को आत्मसात करना शिक्षक दिवस का उद्देश्य है। शिक्षक समाज और राष्ट्र निर्माता होते है, उन्हें सम्मान देना भारत की प्राचीन परंपरा रही है।
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय ,
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।”
“गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरः
, गुरुर साक्षात परम ब्रह्म , तस्मै श्री गुरुवे नमः
ध्यान मूलं गुरुर मूर्ति , पूजा मूलं गुरु पदम्
मंत्र मूलं गुरुर वाक्यं , मोक्ष मूलं गुरुर कृपा ….”
बदलते समय के साथ शिक्षा के व्यवसायीकरण ने शिक्षक और शिष्य के रिश्तो का पैमाना ही बदल दिया है । , जिस कारण शिक्षा और शिक्षक दोनों की परिभाषा बदल गई है। भारत में प्राचीन काल से ही गुरू को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त है, भगवान के बाद गुरू को स्थान दिया जाता है।प्राचीन काल से ही गुरू को देखते हैं स्वतः ही शिष्य सम्मान की मुद्रा में खड़े हो जाते थे ।शिष्य के लिए गुरु उज्जवल जीवन प्रदान करने वाले भगवान का दूसरा रूप थे ,और गुरु के लिए शिष्य धर्म और कर्म दोनों थे।
गुरु का एकमात्र उद्देश्य शिष्य का सर्वांगीण विकास होता था। प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा पद्धति भारत में प्रचलित थी ।जहां छात्रों का सर्वांगीण विकास होता था ।प्राचीन काल में धौम्य ,च्यवन ऋषि, द्रोणाचार्य संदीपानि, वशिष्ठ ,विश्वामित्र ,बाल्मीकि, गौतम, भारद्वाज आदी ,आदिगुरू थे । भगवान बुद्ध, महावीर और शुक्राचार्य भी महानतम गुरु के रूप मे शुशोभित है।गुरुकुल अपने अलग-अलग विधा के लिए विख्यात हुआ करते थे। कोई गुरुकुल वैदिक ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था ,तो कोई गुरुकुल अस्त्र-शस्त्र ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था,किंतु इनसब का उद्देश्य एक था शिष्यों का सर्वांगीण विकास करना ,ताकि जब वह गुरुकुल से निकलकर सांसारिक जीवन में प्रवेश करें तो, अपनी सारी जिम्मेदारी का उचित तरीके से निर्वहन कर सके ।बदलते वक्त के साथ यह परंपराएं दम तोड़ती चली गई। भारत की अस्थिर राजनीति परिस्थिति में गुरुकुल परंपरा को ध्वस्त कर दिया एवं गुरु के सम्मान को भी ध्वस्त करता गया ।
आज की परिस्थिति में गुरु या शिक्षक का सम्मान कम होता जा रहा है। इस कलयुग में ऐसे धार्मिक गुरु भी हो रहे हैं जो गुरु शब्द को ही कलंकित कर रहे हैं ।1526 से लेकर 1947 तक की समयावधि में भारत पर मुगल एवं अंग्रेजों का शासन रहा, जिसने भारत की शिक्षा की प्राचीन परंपरा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। भारत की शिक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ती गई। 1947 के बाद भारत में परंपरागत शिक्षा की जगह अंग्रेजों द्वारा बनाए गए शिक्षा नीति का पालन किया जा रहा है, किंतु जिस शिक्षा की जरूरत भारत के बच्चों को है उस इच्छा से भारत के बच्चे वंचित हो रहे हैं ,या वर्तमान सामाजिक परिस्थिति में शिक्षा के स्वरूप को बदल दिया है ,और शिक्षक के महत्व को कम कर दिया है।
शिक्षा दो तरह से अर्जित की जाती है अब औपचारिक और अनौपचारिक ।औपचारिक शिक्षा में हम विधिवत शिक्षा प्राप्त कर, हम रोजगार प्राप्त करते हैं, व्यवसाय या खेती-बाड़ी करते हैं, या सरकारी नौकरी में जाते हैं, डॉक्टर इंजीनियर बनते हैं, पर यह औपचारिक शिक्षा हमें वह नहीं बनाते जो हमें बनना चाहिए। हमारा जीवन एक संग्राम है की तरह है जिसमें हमें राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक नैतिक सभी जिम्मेदारियों को शिक्षा प्राप्ति के बाद पूर्ण करनी होती है ।यह शिक्षा हमे अनौपचारिक शिक्षा देती है, जो मां की गोद से ही प्रारंभ हो जाती है, एवं यह शिक्षा जीवन पर्यंत चलती है ।यदि हमारा समाज अच्छा है, जीवन के सभी मूल्य का समर्थन करता है, तो निश्चित ही व्यक्ति अच्छा बनेगा, अन्यथा व्यक्ति को बुरा बनना तय है और सारा दोष शिक्षक को दिया जाता है ।आज की शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका तो है ।पर व्यवस्था इस तरह की हो गई है कि शिक्षा में शिक्षक की महत्ता ही कम हो गई है। इसके लिए हम सभी लोग जिम्मेदार है।
हमारी शिक्षा व्यवस्था मैं सुधार तभी हो सकता है जब हमारा समाज और राष्ट्र दोनों में सुधार होगा ।देश से भ्रष्टाचार कम होगा एवं बेरोजगारी कम होगी। लोगों को जीवन में आगे बढ़ने की पूरी संभावना एवं दिशा मिलेगी ,तो खुद ब खुद भारत में शिक्षा एवं शिक्षकों का सम्मान पुनः प्राप्त हो जायगा। बच्चों को सामाजिक राजनीतिक, धार्मिक ,सांस्कृतिक ,एवं नैतिक शिक्षा अनौपचारिक शिक्षा से ज्यादा मिलती हैं, इसलिए स्वस्थ समाज का करना निर्माण करना होगा ताकि, उन्हें स्वस्थ शिक्षा मिल सके, जिससे बच्चे सच्चे देशभक्त ,समाजसेवी एवं जिम्मेदार व्यक्ति बन सके एवं देश के प्रति समाज और अपने परिवार जिम्मेदारी को अच्छे से उठा सके और आने वाले पीढ़ी का सर्वांगीण विकास कर सके।तभी शिक्षक दिवस मनाने का उद्देश्य पूर्ण होगा।
सुनीता कुमारी
पूर्णियाँ बिहार



