संपादकीय/लेख/आलेख

योग-विज्ञान की जीवन में उपादेयता

ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव जी सर्वप्रथम योग का ज्ञान देकर आदि गुरु बने थे। इसी योग को धारण कर भगवान श्री कृष्ण महायोगेश्वर कहलाए। हमारे ऋषि-मुनियों व पूर्वजों ने निश्चित रूप से योग को व्यापक बनाया है। महर्षि पतंजलि के अनुसार योग मन के नकारात्मक अतिरेक को कम करने का विशिष्ट विज्ञान है। योग के व्यापक गुणों की मीमांसा तथा व्याख्या से इन्होंने ही हमें अवगत कराया। कालांतर में योग-विज्ञान पर विविध ग्रंथ भी लिखे गए। वैदिक काल में योग-विज्ञान की एक प्रमुख क्रिया को सूर्य-उपासक आर्यों ने सूर्य नमस्कार का नाम दिया, यह योग कोई धर्म नहीं है। शनैः-शनैः योग-विज्ञान का प्रचार-प्रसार आर्यावर्त की सीमाओं को पार कर गया। जब योग विज्ञान अपने जनक-देश भारत से पूरे विश्व का भ्रमण करते हुए पुनः भारत में ‘योगा’ बनकर लौटा, तब हमें आभास हुआ कि योग का क्या महत्त्व है।

वर्तमान में भारत के विख्यात योगगुरु बाबा रामदेव ने इस अद्भुत एवं चमत्कारिक योग-विज्ञान को देश के जन-जन तक पहुँचाया। आज विश्वव्यापी होने के कारण ही ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ प्रतिवर्ष दिनांक 21 जून को संपूर्ण विश्व में मनाया जाने लगा है। मुख्यतः हमारे द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्रियाओं व अभ्यासों को योग के रूप में मान्यता प्राप्त है। ‘युज’ शब्द जिसका अर्थ ‘योग’ अथवा जोड़ होता है। शरीर और अंतस के जुड़ाव की व्यापक धारणा को ध्यान में रखकर ही इस योग को महत्ता प्राप्त हुई है। योग धर्म, संप्रदाय, लिंग, आयु आदि से ऊपर उठकर ‘सर्वजन हिताय’ है। मानव को पथच्युत होने से बचाने वाला योग, जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करने की एक विधि है। जीवन में आए तनाव तथा मनोविकारों को दूर करने में योग क्रियाएँ आश्चर्यजनक तथा चमत्कारिक परिणाम देती हैं।

अनेक प्रबुद्ध जनों द्वारा योग को कला भी माना गया है, लेकिन अधिकृत रूप से योग ऐसा विज्ञान है जो हमें सदैव स्वस्थ जीवन प्रदान करता है। मानसिक शांति दिलाने तथा विभिन्न बीमारियों को दूर करता है। योग में श्वास का विशेष महत्त्व होता है, जिसे हर उम्र का व्यक्ति कर सकता है। योग प्रमुखतः चार अंगों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम ‘कर्म-योग’ है, जो वस्तुतः अच्छे और बुरे कर्म पर आधारित है, क्योंकि अच्छे विचार हमें मानवोचित संस्कारों की ओर ले जाते हैं तथा बुरे विचार सदैव दुख पहुँचाते हैं। यही दुख मानव जीवन को कठिनाई में डालते हैं। कर्म-योग अच्छे कर्म के माध्यम से अंतस में अच्छे विचारों का बीजारोपण करता है। द्वितीय क्रम में ‘ज्ञान-योग’ आता है, जो हमारे मन एवं हमारी भावनाओं को सकारात्मक दिशा में ले जाने हेतु सक्षम है। ज्ञान-योग हमें जीवन की वास्तविकता के निकट ले जाता है। मानवता का पाठ पढ़ाता है। सद्भावना, त्याग एवं समर्पण के भाव में बढ़ोतरी करता है। तीसरे क्रम में ‘भक्ति-योग’ है, जिसमें मानव अपने इष्ट की स्तुति, प्रार्थना, जप आदि के माध्यम से हृदय की वैचारिक विकृतियों को दूर करता है। चतुर्थ क्रम में ‘क्रिया-योग’ है, जिसमें आसनों व श्वासोच्छ्वास से शरीर के आंतरिक अंगों को स्वस्थ बनाए जाने के साथ-साथ ऑक्सीजन की ग्राह्यता भी बढ़ाता है।

आज आधुनिक विज्ञान द्वारा भी योग-विज्ञान को मान्यता प्राप्त है। देखा गया है कि नियमित योग-विज्ञान की क्रियाओं व मुद्राओं से चिंता, शारीरिक सूजन, हृदय की अस्वस्थता, लचीलापन, पाचन शक्ति, शारीरिक ऊर्जा, निद्रा, शारीरिक दर्द आदि से मुक्ति तो मिलती ही है, इस के अभ्यास से खुशहाल जीवन भी जिया जा सकता है। योग मन को एकाग्र करने की एक विधि भी कही जा सकती है। साँसों के व्यायाम व ध्यान से तन और मन की शुद्धि तो होती है, इसे नियमित करते रहने से मानव दवाईयाँ सेवन करने से भी बचता है, क्योंकि दवाईयाँ किसी दूसरे रूप में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो होती ही हैं। योग हमारे मन में सकारात्मकता लाता है। शरीर में पाए जाने वाले हानिकारक अपशिष्टों को बाहर करता है। अवांछित वजन भी योग से कम किया जा सकता है। शरीर की नसों तथा सभी अंगों तक रक्त संचार बढ़ता है, जिससे त्वचा की कांति में वृद्धि होती है। वायु-विकार एवं मधुमेह भी नियंत्रित रहता है। अवसाद से उबरने में भी योग-विज्ञान सहायक होता है। सिर दर्द, गर्दन दर्द, पीठ दर्द व अनेक बीमारियों की चिकित्सा के रूप में भी योग प्रभावी है।

आज के भागमभाग जीवन में योग-विज्ञान की उपादेयता अत्यंत बढ़ गई है। प्रतिदिन लगभग आधा घंटे के योग से आपका जीवन हमेशा स्वस्थ बना रह सकता है। यही कारण है कि योग के चमत्कारिक परिणामों को देखते हुए व्यक्तिगत, सामाजिक एवं शासकीय स्तर पर भी योग विज्ञान के प्रचार-प्रसार के साथ ही योग-मुद्राओं, आसनों व योग क्रियाओं को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। आइए, हम आज से ही योग-विज्ञान को नियमित रूप से प्रयोग में लाने का संकल्प लें और ‘सर्वे संतु निरामया’ सूत्र को चरितार्थ करें।

– डॉ. विजय तिवारी ‘किसलय’ जबलपुर

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