साहित्य दर्पण

लफ्ज़

कागज़ और कलम
ने किया है दर्ज
जिन्दगी के पन्नों पर,

क़तरा-ए-अश्क से जख्म
जो लफ्फाजों में
अब रिस रहे हैं !

जलवा बेरुखी का
अब बहुत हुआ
लफ्जों को दे आकार,

हसीन वफ़ा का नया
इक अफसाना लिख
शाद-आबाद खुद किया है !

मन को जो भाए
प्यार के अल्फाज़
बनाई इक गज़ल है,

इश्क के पन्नों पर
अहल-ए-दिल से
नाम तेरा ही उकेरा है !

मुनीष भाटिया
585, स्वास्तिक विहार, ज़ीरकपुर,(मोहाली), चंडीगढ़ I
9416457695

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