जनसंपर्क कार्यालय में अधिकारी और तथाकथित पत्रकारों के बीच हाथापाई

मनीष श्रीवास छत्तीसगढ़ जबलपुर दर्पण । छत्तीसगढ़ से एक शर्मनाक करने वाली घटना सामने आई है जहां जनसंपर्क विभाग में पदस्थ संयुक्त संचालक श्री संजीव तिवारी पर कुछ तथाकथित पत्रकारों ने हमला कर दिया। क्या सही क्या गलत बड़ा प्रश्नीय?
कलम वीर ने ऐसा क्यों किया ? ये हमला केवल व्यक्ति पर नहीं था, यह पत्रकारिता की मर्यादा, साख और सच्चाई पर भी वार किया गया।
क्या विज्ञापन मांगने का यह नया तरीका शायद अब “पत्रकारिता” कहलाने लगा है। जो कभी कलम के बल पर व्यवस्था से सवाल पूछता था, वह अब हाथ और जुबान के बल पर विभाग से विज्ञापन मांग रहा है। यह सिर्फ अनुशासनहीनता नहीं यह पेशे की आत्मा पर धब्बा है।
जनसंपर्क विभाग सदैव संवाद, सहयोग और पारदर्शिता का माध्यम रहा है। यह विभाग पत्रकारों के हित में काम करता है लेकिन हित का अर्थ यह नहीं कि अधिकारी को धमकाओ, और मर्यादा की हर सीमा को तोड़कर “मीडिया की आज़ादी” का झंडा उठाओ।
पत्रकारिता कभी गुंडागर्दी का आवरण नहीं रही।
पत्रकार का धर्म था सवाल पूछना, सच उजागर करना।
पर अब कुछ लोगों ने इसे “विज्ञापन वसूली” का व्यवसाय बना दिया है। ये वही लोग हैं जो कलम को हथियार और प्रेस कार्ड को लाइसेंस समझ बैठे हैं।
अगर व्यवस्था पर प्रहार करना ही पत्रकारिता है,तो पहले अपने भीतर की व्यवस्था देखनी होगी। क्योंकि जो अनुशासन अपने भीतर नहीं रखता,वह समाज में व्यवस्था नहीं ला सकता।
जो कुछ हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है पर उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि ऐसे लोगों को अब भी “पत्रकार” कहा जा रहा है। समय आ गया है कि पत्रकारिता और गुंडागर्दी के बीच की रेखा फिर से खींची जाए। और मर्यादित रह कर समाज में पहचान पर कभी दाग न लगे।



