सतना दर्पण

डायग्नोस्टिक सेंटर की सोनोग्राफी रिपोर्ट पर गंभीर आरोप, जवाबदेही तय करने की मांग

सतना जबलपुर दर्पण । सतना के एक डायग्नोस्टिक सेंटर की सोनोग्राफी रिपोर्ट में चौंकाने वाली त्रुटि सामने आने के बाद चिकित्सकीय लापरवाही और नियमों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि डॉक्टर अरविंद सर्राफ द्वारा जारी रिपोर्ट में एक पुरुष मरीज के पेट में गर्भाशय (बच्चेदानी) — वह भी उल्टी स्थिति में — दर्शा दिया गया। जानकारों का कहना है कि यह सामान्य तकनीकी भूल नहीं, बल्कि गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही के साथ आपराधिक प्रकृति का मामला है।

डॉ. अरविंद सर्राफ ने इस संबंध में सफाई देते हुए दावा किया है कि कंप्यूटर ऑपरेटर ने मेल के स्थान पर फीमेल फॉर्मेट चुन लिया, जिससे यह त्रुटि हुई। हालांकि, इस तर्क को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि ऑपरेटर ने गलत फॉर्मेट भी चुना, तो रिपोर्ट पर अंतिम हस्ताक्षर डॉक्टर के ही होते हैं। हस्ताक्षर यह दर्शाते हैं कि रिपोर्ट पढ़कर और संतुष्ट होकर ही उसे प्रमाणित किया गया होगा। ऐसे में पूरी जिम्मेदारी ऑपरेटर पर डालना तथ्यात्मक और नैतिक रूप से अनुचित बताया जा रहा है।

यह भी तर्क दिया जा रहा है कि एमडी और विशेषज्ञ डॉक्टर सोनोग्राफी की अधिक फीस इसलिए लेते हैं, क्योंकि वे स्वयं रिपोर्ट का अवलोकन कर निदान सुनिश्चित करते हैं। यदि रिपोर्ट बिना देखे हस्ताक्षर की गई, तो यह न केवल पेशेवर कर्तव्य की अनदेखी है, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ भी माना जाएगा।

मामले में दूसरा बड़ा सवाल यह है कि सोनोग्राफी बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श (रेफरल) के नहीं की जा सकती, जबकि आरोप है कि यहां ‘ऑन रिक्वेस्ट’ सोनोग्राफी की गई। यह प्रक्रिया संचालन अनुमति और तय नियमों के प्रतिकूल बताई जा रही है, जो सेंटर के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई का पर्याप्त आधार मानी जा रही है।

आरोपकर्ताओं का कहना है कि यह घटना संकेत देती है कि सेंटर में सोनोग्राफी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं, जहां डॉक्टर की भूमिका केवल हस्ताक्षर तक सीमित रह गई है और रिपोर्ट तैयार करने का कार्य ऑपरेटर द्वारा बिना समुचित चिकित्सकीय निरीक्षण के किया जा रहा है। इसी का परिणाम है कि एक पुरुष मरीज को रिपोर्ट में महिला दर्शा दिया गया।

प्रकरण को लेकर मांग की जा रही है कि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) तथा पुलिस प्रशासन इसे गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच करें और दोषियों पर सख्त व संदेशपरक कार्रवाई सुनिश्चित करें, ताकि भविष्य में किसी भी मरीज के साथ ऐसी लापरवाही न हो और चिकित्सा व्यवस्था में विश्वास बना रहे।

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