67 लाख से अधिक टैक्स बकाया प्रकरण

महापौर योगेश ताम्रकार व पार्षद गोपीचंद गेलानी का स्थगन आवेदन खारिज
सतना जबलपुर दर्पण । जिला सतना के तृतीय व्यवहार न्यायाधीश (वरिष्ठ खंड) ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए महापौर योगेश ताम्रकार एवं पार्षद गोपीचंद गेलानी (प्रतिवादी क्रमांक–6) द्वारा दायर कार्यवाही स्थगन आवेदन को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय में लंबित याचिका के आधार पर इस वाद की सुनवाई रोकी नहीं जा सकती।
यह मामला आम आदमी पार्टी सतना के नेता डॉ. अमित सिंह द्वारा दायर वाद से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि महापौर योगेश ताम्रकार पर नगर निगम सतना का ₹67,15,369/- तथा पार्षद गोपीचंद गेलानी पर ₹16,45,396/- का टैक्स बकाया है। वादी का कहना है कि मध्यप्रदेश नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के अनुसार इतनी बड़ी राशि का टैक्स बकाया होने पर संबंधित जनप्रतिनिधि पद से स्वतः अयोग्य हो जाते हैं। इसी आधार पर न्यायालय से महापौर एवं पार्षद पद को रिक्त एवं निर्हरित घोषित करने की मांग की गई है।
न्यायालय में नहीं टिका स्थगन का तर्क
महापौर एवं पार्षद की ओर से यह दलील दी गई कि नगर निगम द्वारा जारी डिमांड नोटिस — महापौर के मामले में ₹67,09,994/- और पार्षद के मामले में ₹16,45,396/- — को माननीय उच्च न्यायालय, जबलपुर द्वारा 04 अगस्त 2025 एवं 31 जुलाई 2025 को “आगामी आदेश तक” स्थगित किया गया है, इसलिए इस प्रकरण की कार्यवाही भी रोकी जाए।
इस पर न्यायालय ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश केवल डिमांड नोटिस के प्रभाव तक सीमित है, न कि व्यवहार न्यायालय में लंबित इस वाद की सुनवाई पर। अतः कार्यवाही स्थगित करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
दुर्भिसंधि की आशंका भी उठी
वादी डॉ. अमित सिंह की ओर से यह आपत्ति भी दर्ज कराई गई कि नगर निगम (प्रतिवादी क्रमांक–5) तथा महापौर एवं पार्षद (प्रतिवादी क्रमांक–6) द्वारा एक ही अधिवक्ता की नियुक्ति की गई है, जिससे प्रकरण को प्रभावित करने हेतु आपसी दुर्भिसंधि (Collusion) की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
13 फरवरी 2026 को अगली सुनवाई
न्यायालय ने सभी तर्कों पर विचार करते हुए स्थगन आवेदन को निरस्त कर दिया तथा प्रकरण को जवाब-दावा (Written Statement) के लिए 13 फरवरी 2026 को नियत किया है।
याचिकाकर्ता डॉ. अमित सिंह का बयान
डॉ. अमित सिंह ने न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए कहा—
“मैं सतना की जनता के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा। लोकतांत्रिक पद पर बैठे व्यक्ति पर लाखों रुपये का टैक्स बकाया होना गंभीर नैतिक और कानूनी प्रश्न है। न्यायालय का यह आदेश सत्य, पारदर्शिता और जनहित की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
यह मामला अब नगर निगम प्रशासन, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता को लेकर चर्चा का केंद्र बनता जा रहा है।



