लाॅकडाऊन में जीवनोपयोगी अवयव देने वाली गाय को सड़कों पर छोड़ा बेसहारा

नरसिंहपुर दर्पण। भारतवर्ष में धर्मिक भावना में लगभग शतप्रतिशत विज्ञान सम्मत नियम कायदे हैं। जिसमें गौ को माता की उपमा देना भी शामिल है। क्योंकि सारी सृष्टि में गौ के दूध के तुल्य और कोई संपूर्ण भोजन नही हैं। कहा जाता है कि यदि माॅ का दूध बच्चे के लिए प्र्याप्त न हो तो केवल गाय के दूध से ही बच्चे को संपूर्ण आहार के रूप में देकर उसे पाला जा सकता है। भारतीय सनातन धर्म में भी गाय के रोम रोम को देवी देवताओं का पर्याय माना गया है।
यहां तक कि गौमूत्र की तुलना पवित्र गंगा एवं गोबर की तुलना लक्ष्मी से की गई है। इसका न केवल धार्मिक कारण वल्कि विज्ञानिक दृष्टि से भी प्रमाणित है कि गाय के गौमूत्र की गंगा जैंसी पवित्रता का कारण उसमें अनेकों मिनरल्स का होना पाया गया है। एवं गोबर में वातावरण को रोगाणु विषाणु रहित करने वाले जीवाणुओं की मौजूदगी पाई गई है। वैज्ञानिक यह भी सिद्ध कर चुके हैं कि गाय स्वसन क्रिया में हमेशा शुद्ध आक्सीजन छोड़ती है। हम इतने महत्व पूर्ण जीवनोपयोगी अवयव देने वाली गाय को सड़कों पर दुर्घटना ग्रस्त होने व भूख प्यास से तड़पने उसे बेसहारा छोड़ रहे हैं जबकि यदि मनुष्य चाहे तो गाय के जैंसा कोई विज्ञान सम्मत उपकरण करोड़ों रूप्यों की लागत लगाकर न तो विकसित कर सकता हैं और न ही खरीद सकता है। जिसे हम अनुपयोगी मानकर बेसहरा छोड़ रहे हैं। जिससे वह भूखप्यास से असमय मौत का शिकार हो रही है।
लोग पत्थर की मूर्ति को मंदिरों में पूजते हैं लाखों का चढ़ावा चढ़ाते हैं लेकिन साक्षात माता का रूप धारण किए गाय एक टोकनी चरवन एक वाल्टी पानी के दर दर भटक रही है क्या यही है भारत का धर्म और गाय की हालात। शासन प्रशासन द्वारा लाखों रूप्यों को खर्च करके गाय के आहार विहार हेतु प्रबंध कर दिए गए हैं लेकिन उनमें भी पानी व चरवन आदि की काई व्यवस्थाऐं नही हैं। वर्तमान में लाॅकडाऊन की स्थिति है। जिससे सभी बाजार दुकाने आदि सब कुछ बंद हैं जिससे गली बाजारों दुकानों के आसपास पेट की भूख को कुछ हद तक शांत करने हेतु गौबंश को कुछ मिल जाया करता था वही बंद हो गया है। गाय अपने नवजात बछड़े को छोड़कर बात्सल्य को पेट की अग्नि में जलाकर बहुत दूर दूर तक खाने पीने के लिए निकल जाती है। जबकि खेतों में लोग फसलों को हार्वेस्टर आदि के काटकर गौबंश के चरवन हेतु उपयोगी भूषा को खेत में ही आग के हवाले कर देता हैं जिसमें के हजारों गौबंश वर्ष भर तक अपनी भूख को शांत कर सकता है। ऐंसा निदर्यता पूर्ण भारत का मनुष्य कैंसे हो सकता है भारतवर्ष में गाय का ऐंसा निर्मम दृष्य बहुत ही दुखद हैं। शासन प्रशासन ने ग्राम पंचायतों एवं स्थानीय स्वसहायता संस्थाओं को इन गौवंशों की देखरेख को जिम्मा सौंप रखा हैं जबकि ग्राम पंचायतें अपने खुद के कामों में फर्जीवाड़ों से फुरसत नही मिलता और स्वसहायता समूहों में ऐंसे सदस्य है जिन्होने अपने स्वयं के गौबंशों को आवारा बेसहारा छोड़ रखा है। और जिनके जिम्मे यह गौशालाऐं छोड़ रखीं हैं तो गौवंश की ऐंसी दुर्दशा होना तो तय ही है। क्या प्रशासन गौशालाओं में कोई पुख्ता प्रबंध कर सकने में सक्षम है। बताया गया है कि इन स्वा सहायता समूहों को गोवंश के देख भाल के लिए शासन के द्वारा कोई राशि नहीं मिलने के कारण गौशाला में रहने वाले गौबंशो को भूसा चारापानी ना मिलने के कारण मौत के कगार पर पहुंच रहे हैं। गोटेगांव जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत बेलखेड़ी, करेली जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत बरमान कलाॅ एवं चाबरपाठा जनपद की ग्राम पंचायत पीपरपानी की गौशाला का निरीक्षण जिला मानद पशु कल्याण अधिकारी भागीरथ तिवारी के साथ पत्रकार अभय हिंदुस्तानी, गीतगोविंद पटेल, सुभाष तेनगुरिया आदि ने किया तो वहां पर जाकर गौबंश की दुर्दशा देखकर हतप्रभ रह गए। यहां के गोशाला में गौबंशो के चरवन हेतु भूसा चारा पानी नही मिल पा रहा है। जिसके कारण यहां पर गौबंशा मरने की स्थिति में पहुंच चुके हैं। जबकि कुछ गौबंशों के मौत भोजनपानी न मिल पाने से होने की भी जानकारी यहां पर मिली है। कई गौशालाओं में तो यहां के गौबंशों के घूमने फिरने के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं है। इसी तरह भी अन्य गो शालाओ की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है। जिला मानद पशु कल्याण अधिकारी भागीरथ तिवारी ,अभय हिंदुस्तानी ,पंकज सोनी गीत गोविंद पटेल सुभाष तेनगुरिया ,मनोज शुक्ला, संदीप राजपूत ने जिला प्रशासन से अपेक्षा की है कि गोबंशो की मौत भूसा चारा पानी से ना हो इस हेतु सार्थक प्रयास करें।



