मध्य प्रदेशसंपादकीय/लेख/आलेखसाहित्य दर्पण

महामारी में मजबूर , देश का मजदूर

हमारे देश के गरीब मजदूर की स्थिति से हम सभी परिचित हैं. मजदुर की परिभाषा क्या है? दुःख, दरिद्रता, भूख, अभाव, कष्ट, मज़बूरी, शोषण और अथक परिश्रम- इन सबको मिला दें तो भारतीय मजदूर की तस्वीरें उभर कर आती हैं.
एक मजदूर देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है और उसका देश के विकास में अहम् योगदान होता है. मजदूरों के बिना किसी भी राष्ट्र के विकास के ढांचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती. इसलिए मजदूरों का समाज में अपना ही एक स्थान है, लेकिन आज भी देश में कोरोना महामारी में मजदूरों के साथ अन्याय और शोषण होता है.

उन्नत देशों के मजदूर और भारत के मजदूर में जमीन आसमान का अंतर है. वहां के मजदूर भी सम्मानित हैं. उसके पास सुख साधनों की कमी नहीं है. उन्नत देशों में मजदूरी बहुत महंगी है. वहां मजदूर कम और काम अधिक है इसलिए बड़े-बड़े पूंजीपति, मालिक और नागरिक मजदूर के इर्द-गिर्द घूमते हैं तथा उन्हें अच्छी मजदूरी देते हैं.
लगभग डेढ़ साल पहले आई कोरोना महामारी ने मानवजाति के अस्तित्व पर एक बड़ा खतरा पैदा कर दिया। इस महामारी से समाज का हर वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहा है लेकिन सबसे अधिक बुरी स्थिती उन मजदूरों की है जो अपने परिवार के लालन पालन के लिए गांव से निकलकर बड़े शहरों में रोजगार की आज में जाते है उन्हे बड़े शहरों में रोजगार मिलता भी है लेकिन महामारी ने उनसे रोजगार छीन लिया जिससे लाखों करोड़ों मजदूरों को अपना काम छोड़कर अपने गांव वापस जाना पड़ा। कहा जा सकता है कि आज देश का मजदूर अव्यवस्थाओं के कारण मजबूर है और देश के निर्माण और विकास में जो उसने खून पसीना एक कर दिया उसे है अपने अस्तित्व बचाने के लिए जूझना पड़ रहा है।
आज 1 मई अर्थात अंतराष्ट्रीय मजदूर दिवस है तो जानते है कि महामारी से किस प्रकार मजदूर का जीवन बर्बाद हो रहा है।
गरीबी और लाचारी उन्हें पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने में धकेलते रहती है. वे गठरी टांगे हुए अपने स्थायित्व की तलाश में भटकते रहते हैं. जब स्थिति सामान्य रहती है, तब समाज के सबसे निचली तह में इनकी जिंदगी गलते-घुलते रहती है. दुनिया को लगता है कि सब कुछ साफ और सुंदर है. लेकिन, जैसे ही स्थितियां प्रतिकूल होती हैं, सबसे निचली तह में दबे हुए अदृश्य लोग अचानक दिखने लगते हैं. प्राकृतिक आपदा-विपदा, युद्ध आदि स्थितियों में उनकी बदहाली समाज की ऊपरी सतह पर तैरने लगती है.
आज दुनिया को कोरोना नामक महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया है. दुनियाभर में लाखों करोड़ो लोग संक्रमित है, लाखों लोग मारे जा चुके हैं और इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था की जड़ों को हिला कर रख दिया है. इसका सबसे बुरा असर गरीबों और मजदूरों पर पड़ा है. कोरोना के हमले ने स्वास्थ्य चिंताओं के साथ हमारी सामाजिक-आर्थिक अव्यवस्था को भी उजागर कर दिया है.
आपदाएं या युद्ध मनुष्य द्वारा निर्मित व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर देती हैं. मानव सभ्यता इस तरह की आपदाओं से संघर्ष करते हुए निर्मित हुई है. इस तरह की विपत्तियों का सामना करने के लिए ही सुदृढ़ व्यवस्था का निर्माण किया जाता है. आज जब हम हजारों की संख्या में बच्चों सहित लौटते मजदूरों को देख रहे हैं, तो यह सिर्फ महामारी के परिणामस्वरूप नहीं है, बल्कि हमारी सामाजिक-आर्थिक अव्यवस्था का भी परिणाम है. इन मजदूरों की सामाजिक स्थिति क्या है? क्या सामाजिक सुरक्षा के होते हुए इन्हें इन भीषण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता? क्या इन्हें ढाई-तीन साल के बच्चों के साथ पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने की जरूरत पड़ती?
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) के मुताबिक, वैश्विक महामारी (Pandemic) के कारण भारत में रोजमर्रा के काम करने वाले मजदूरों को अपने गांवों की ओर लौटना पड़ा. इससे असंगठित क्षेत्र (Unorganised Sector) में काम करने वाले 40 करोड़ मजदूरों (Labour) का काम लगभग छिन चुका है।
कोरोना वायरस (Coronavirus) पूरी दुनिया पर चौतरफा मार कर रहा है. इसकी दूसरी लहर के कारण मौत का तांडव हो रहा है। एक तरफ लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ रही है तो दूसरी तरफ मजबूत से मजबूत अर्थव्‍यवस्‍थाओं (World Economies) की हालत भी बिगड़ रही है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) का आकलन कहता है कि कोरोना वायरस के कारण भारत के असंगठित क्षेत्र पर सबसे बुरी मार पड़ी है. इस क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ मजदूरों के गरीबी में फंसने के हालात पैदा हो सकते हैं. आईएलओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन (Lockdown) की वजह से मेट्रो और बड़े औद्योगिक शहरों में रहकर रोज कमाने-खाने वालों को अपने गांव लौटना पड़ा है. वहीं, कारोबारी गतिविधियां भी पूरी तरह से ठप हो गई हैं. इससे भविष्‍य में भी उनको लौटने पर काम मिलना आसान नहीं होगा. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ऐसे हालात से निपटने के लिए तैयार नहीं है.’आईएलओ निगरानी- दूसरा संस्करण: कोविड-19 और वैश्विक कामकाज’ शीर्षक से जिनेवा में जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल दुनिया भर में 19.5 करोड़ लोगों की नौकरी छूट सकती है. आईएलओ ने कोरोना वायरस को दूसरे विश्व युद्ध (World War 2) के बाद सबसे भयानक संकट बताया है. कोरोना की रोकथाम के लिए लॉकडाउन और दूसरे उपायों की वजह से भारत, नाइजीरिया व ब्राजील की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम कर रहे मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. भारत में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में 90 फीसदी मजदूर काम करते हैं. ऐसे में इन लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इंडेक्स में भी भारत के लॉकडाउन को सबसे ऊपर रखा गया है. लॉकडाउन के कारण शहरों में काम करने वाले मजदूरों पर सबसे ज्यादा असर पडा है. वे काम नहीं होने के कारण गांव लौटने पर मजबूर हो गए हैं.
कोरोना वायरस के कारण अलग-अलग आमदनी वाले समूहों में नुकसान की आशंका है. खासतौर पर अपर-मिडिल इनकम वाले देशों में लोगों की कमाई में करीब 7 फीसदी की कमी हो सकती है. यह 2008-09 की आर्थिक मंदी से भी ज्यादा होगी. हाउसिंग, फूड सर्विस, मैन्यूफैक्चरिंग, रिटेल और बिजनेस सेक्‍टर में इसका सबसे ज्‍यादा असर नजर आएगा. इस वजह से साल 2021 में बेरोजगारी भी बढ़ेगी. संगठन ने शुरुआत में अंदाजा लगाया था कि महामारी की वजह से 2.5 करोड़ लोगों के रोजगार पर असर पडेगा. नया आंकड़ा पहले से काफी ज्‍यादा है. पूरी दुनिया में इस समय 3.3 अरब लोग काम करते हैं. इनमें हर पांच में चार लोग कार्यस्थल के पूरी तरह या आंशिक बंद होने से प्रभावित हैं.
यदि भारत सरकार ने मजदूरों की भायावय होती स्थिति को देखकर भी अनजान बने रहे तो हो सकता है इतनी बड़ी आबादी को भूखों मरना पड़े।
और हो सकता है देश विरोधी ताकतें इन्हे लालच या पैसा देकर इनकी मजबूरी का फायदा उठाकर इन्हे नक्सलवाद, आतंकवाद या अन्य अपराध की तरफ ले जाए???

मुकेश कुमार सेन शांतम प्रज्ञा मिशन जबलपुर
मुकेश कुमार सेन
शांतम प्रज्ञा मिशन
जबलपुर

 

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