मध्य प्रदेशशहडोल दर्पण

तो क्या अब भी विसर्जित हो रहा ओपीएम पेपर मिल का दूषित जल सोन नदीं में

प्राकृतिक संसाधनों और प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं का संरक्षण न सिर्फ संविधान की कायदो में वर्णित है अपितु इसके दोहन पर न्यायालयीन विधा भी बनाई गई है जिसे हम एनजीटी के नाम से जानते हैं और जिले में इस एनजीटी के नियमों का परिपालन कराने वाला विभागीय अमला प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड है ,पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड शहडोल जिले द्वारा दर्जनो ऐसे कल कारखानों के प्रदूषण को कागजी कोरम पूर्ति करके नजरअंदाज कर दिया जाता है जिस पर उन्हें वास्तविक रूप से कार्यवाही करना चाहिए।
यह आलम सिर्फ ओपीएम पेपर मिल का नही बल्कि रिलायंस इंडस्ट्रीज, सोडा फैक्ट्री,व अनूपपुर में स्थित मोजरबेयर थर्मल पावरप्लांट ये सभी कम्पनियां नदियों के अस्तित्व पर सेंध लगाते आ रहे हैं।
ओपीएम पेपर मिल से निकला धुआं और उसके दुर्गंध से पूरा क्षेत्र वाकिफ हैं यही नही इसका दुर्गंध मानव स्वास्थ्य व श्वास नली के लिए हानिकारक तो है ही सांथ ही चलित जलधारा को भी यह कम्पनी अरसों से दूषित करने में कोई कसर नही छोड़ रही है यह कोई नया वाकया नही जब ओपीएम जैसी कम्पनियों के लिए अखबारों में खबरे प्रकाशित हुई हो बल्कि इस गंदगी व दूषित माँमले की जानकारी न्यायालय तक गई है पर कम्पनी की साख ने माँमले को सिमटा कर रफा-दफा कर दिया

सोन नदी में दूषित जल छोडऩे का मामला, याचिका में नियमों के उल्लंघन का आरोप-नेशनल ग्रीन टिब्यूनल में शहडोल जिले की अमलाई ओरिएंटल पेपर मिल से निकलने वाले जेड 2 श्रेणी के दूषित जल को सोन नदी में छोड़े जाने को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि नदी के दूषित जल के कारण स्थानीय लोगों और मवेशियों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है और कृषि उपज भी प्रभावित हो रही है।  एनजीटी की युगल पीठ ने ओरिएंटल पेपर मिल और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी करे जवाब-तलब कर चुका है पर कम्पनी का यह ढुलमुल रवैया आज भी देखने को मिलता है।

याचिका दायर होने के सांथ पैरवी भी हुई थी-पूर्व में एक याचिकाकर्ता की ओर से दायर याचिका में कहा कि ओरिएंटल पेपर मिल की वार्षिक उत्पादन क्षमता 85 हजार टन है। सूत्रों की माने तो प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड द्वारा अप्रैल 2014 में फैक्टरी का निरीक्षण किया था। अपनी रिपोर्ट में कहा था कि नदी से निकलने वाला औद्योगिक दूषित जल जेड 2 श्रेणी का है जो प्रतिदिन 13 हजार 5 सौ क्यूसेक मीटर नदी में छोड़ा जा रहा है। जो निर्धारित शर्तो का उल्लंघन है। बोर्ड द्वारा फैक्टरी के खिलाफ न्यायालय में प्रकरण भी दायर किया गया था। याचिका में कहा गया कि इसके बाद भी फैक्ट्री द्वारा नदी में प्रदूषित जल छोड़ा जा रहा है। जिससे नदी का जल प्रदूषित हो रहा है। याचिकाकर्ता के तर्क सुनने के बाद एनजीटी की युगल पीठ ने अनावेदक पक्षों को नोटिस जारी करके जवाब मांगा था जिसकी पैरवी भी की गई थी।

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