सेकंडरी केयर पर ध्यान देकर टाल सकते हैं 80% ऑपरेशन

जबलपुर दर्पण। स्वास्थ्य क्षेत्र को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। प्राइमरी, सेकंडरी व टर्शीयरी केयर। मरीज को सामान्य उपचार की जरूरत को पहली श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञ चिकित्साक से उपचार अथवा सामान्यय सर्जरी की आवश्यकता दूसरी श्रेणी में आती है। मरीज को स्वास्थ्य केंद्र में किसी प्रक्रिया के लिए रेफर करना तीसरी श्रेणी में आता है। जबलपुर समेत प्रदेश भर में चिकित्सा की दूसरी श्रेणी की अनदेखी की जा रही है। जिस पर ध्यान देकर अस्पतालों पर 80 प्रतिशत ऑपरेशन का बोझ कम किया जा सकता है। उक्त बातें आइएमए अध्यक्ष व नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. पवन स्थापक ने जन ज्योलति सुपर स्पेिशियलिटी अस्पताल में शनिवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में कही। डॉ. स्था पक ने कहा कि जबलपुर, भोपाल, इंदौर, उज्जैोन समेत प्रदेश के अन्य शहरों में सेकंडरी केयर सर्जरी को किफायती बनाने की आवश्यकता है। सेकंडरी हेल्थ केयर की चुनौतियों को दूर कर सस्ते ऑपरेशन और मरीजों की देखभाल को त्रुटिहीन बनाना समय की मांग है। ऐसा न होने के कारण टर्शीयरी केयर में भी मरीज खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। इस दौरान अनुपमा स्थापक आदि मौजूद रहीं। सिर्फ उपचार, जागरूक नहीं करते चिकित्सक का धर्म मरीज का उपचार ही नहीं बल्कि उसे जागरूक करना भी होता है। डॉ. स्थापक ने कहा कि जागरूकता के अभाव में मरीज प्राइमरी केयर से सीधे टर्शरी हेल्थ केयर और सर्जिकल केयर में पहुंचने लगा है। इसलिए प्राइमरी केयर में ही मरीजों को जागरूक किया जाए। जागरूकता के अभाव में उन बीमारियों का भी ऑपरेशन कर दिया जाता है, जिन्हें दवा से ठीक किया जा सकता है।
समय से रेफर किए जाएं मरीज
डॉ. स्थापक ने कहा कि कई बार ऐसा भी होता है जब सेकंडरी अथवा टर्शीयरी केयर में मरीज विलंब से पहुंचते हैं, जिसके कारण बीमारी का जोखिम व उपचार में होने वाला खर्च बढ़ जाता है। विकसित देशों की तुलना में भारत में बीमारियों का बोझ क्यों ज्यादा है डॉ. स्थापक ने कहा कि ऑपरेशन से पहले व बाद में मरीज की देखरेख चिकित्सा का अहम हिस्सा है।



