“जीवित को न पूछते, चित्र को क्यों पूजते…?”

छत्तीसगढ़ जबलपुर दर्पण । पितृपक्ष आरंभ हो गए हैं। भारतीय परंपरा में इस पखवाड़े का विशेष महत्व है। लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु श्राद्ध, तर्पण और भंडारे का आयोजन करते हैं। यह निस्संदेह श्रद्धा का प्रतीक है।
परंतु एक प्रश्न हर संवेदनशील हृदय को कचोटता है—
जब व्यक्ति जीवित था तब उसे एक गिलास पानी, एक टुकड़ा रोटी, एक प्यार भरा शब्द क्यों न दिया गया?
क्यों हम जीते-जागते रिश्तों की प्यास बुझाने से कतराते हैं और मरने के बाद दान-पुण्य की होड़ में आगे रहते हैं?
श्राद्ध का वास्तविक अर्थ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा है। यदि वास्तव में हम अपने पूर्वजों और अपनों की आत्मा की शांति चाहते हैं तो ज़रूरत है कि हम जीवितों का सम्मान करें।
भूखे को अन्न, प्यासे को जल, दुखी को सहारा, और अपने प्रियजनों को स्नेह देना ही सबसे बड़ा श्राद्ध है।
चित्र बनवाकर, नाम से भंडारा करवाकर या घंटे-घंटे मंत्र पढ़कर हम आत्मा को शांति नहीं दिला सकते, जब तक हम इंसानियत के कर्तव्य जीवित मनुष्यों के प्रति नहीं निभाते।
सही श्राद्ध वही है जो जीवन में ही किया जाए—अपने माता-पिता, बुजुर्गों, परिजनों और ज़रूरतमंदों को प्यार और सहयोग देकर।



