जबलपुर दर्पणमध्य प्रदेश

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा की फर्जी नियुक्ति का खुलासा

जबलपुर दर्पण। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई), जबलपुर ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर राजेश कुमार वर्मा की नियुक्ति को लेकर गंभीर आरोप लगाए। एनएसयूआई ने दावा किया कि प्रो. वर्मा की नियुक्ति में नियमों की अनदेखी की गई है, और उन्हें अनिवार्य योग्यता के बिना ही कुलगुरु के पद पर नियुक्त किया गया है। संगठन ने उनकी तत्काल इस्तीफे की मांग की और इस मामले में आंदोलन की चेतावनी दी है।

एनएसयूआई के जिला अध्यक्ष सचिन रजक ने कहा कि प्रो. वर्मा की नियुक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) द्वारा निर्धारित मानकों का उल्लंघन करती है। उन्होंने बताया कि प्रो. वर्मा को 2008 में पीएचडी उपाधि प्राप्त हुई, और उनके पास प्राध्यापक पद के लिए आवश्यक दस वर्षों का अध्यापन अनुभव 2009 तक पूरा नहीं था। इसके बावजूद उन्हें सीधे प्राध्यापक पद पर नियुक्ति दी गई, जो कि नियमों के खिलाफ है।

सचिन रजक ने कहा, “प्रोफेसर पद के लिए विज्ञापन में यह स्पष्ट किया गया था कि आवेदक के पास पीएचडी के बाद दस वर्षों का अनुभव होना चाहिए, और यह अनुभव 20 फरवरी 2009 तक होना आवश्यक था। प्रो. वर्मा ने 2008 में पीएचडी की थी, और विज्ञापन की तिथि तक उनके पास अनुभव नहीं था, फिर भी उन्हें सीधे प्राध्यापक पद पर नियुक्त कर दिया गया। यह साफ तौर पर नियमों का उल्लंघन है।”

एनएसयूआई ने यह भी आरोप लगाया कि प्रो. वर्मा के पास विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के अनुसार शोध निदेशक के रूप में अनुभव भी नहीं था, क्योंकि उन्होंने 2008 में पीएचडी की थी और 2009 तक उनके अधीन कोई शोध कार्य नहीं किया गया था। इसके बावजूद उन्हें प्राध्यापक पद पर नियुक्ति दी गई, जो कि यूजीसी के विनियमों का उल्लंघन है।

संगठन ने यह सवाल उठाया कि जब उनकी नियुक्ति ही नियमों के खिलाफ थी, तो उन्हें कुलगुरु बनाना और भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। रजक ने कहा, “यदि इनकी नियुक्ति ही अवैध है, तो ये विश्वविद्यालयों का संचालन कैसे कर सकते हैं?”

एनएसयूआई ने आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश के शासकीय विश्वविद्यालयों में कई बार जोड़-तोड़ कर नियुक्तियाँ की जाती हैं, जिससे उच्च शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता की कमी हो रही है। इस कारण प्रदेश के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए अन्य राज्यों में जाना पड़ता है।

इस मामले में पूर्व आयुक्त उच्च शिक्षा द्वारा भी शिकायत की गई थी कि 2009 में हुई प्राध्यापक भर्ती में गड़बड़ियाँ थीं, लेकिन इसके बावजूद सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। एनएसयूआई ने मांग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

इसके अलावा, संगठन ने यह भी संदर्भित किया कि उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने ऐसे मामलों में स्पष्ट निर्णय दिए हैं कि आवश्यक अनुभव की गणना पीएचडी उपाधि प्राप्त करने के बाद से की जाएगी, न कि उससे पहले।

एनएसयूआई ने इस मामले को लेकर आंदोलन की योजना बनाई है और मांग की है कि प्रो. राजेश कुमार वर्मा को अपने पद से तत्काल इस्तीफा देना चाहिए।

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