अपना पेट भरने में लगे हैं बॉलीवुड के पीआरओ

लेखक: शामी एम् इरफ़ान, मुम्बई.लाॅकडाउन का तीसरा चरण आरम्भ हो चुका है. कोरोना के बढ़ते कहर से हरेक नागरिक के मन में दहशत का माहौल बन गया है. जिसके कारण हर समझदार व्यक्ति घरों मे दुबका हुआ है. कुछ अराजकतत्व माहौल को बिगाड़ने के लिए खुलेआम घूम रहे है. रोकथाम, महामारी से बचाव के प्रयास युध्द स्तर पर जारी हैं. उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद में एसएसपी /डीआईजी के पीआरओ की कोरोना पॉज़िटिव रिपोर्ट आने से प्रशासनिक अधिकारियों के मध्य एक अलग ही भय व्याप्त हो गया है. इस खबर से अन्य क्षेत्रो में कार्यरत पी आर ओ भी डर से गये हैं. बॉलीवुड के पी आर ओ का विश्लेषण कर रहे हैं स्वतंत्र पत्रकार व लेखक शामी एम इरफ़ान।
बॉलीवुड के पी आर ओ में तो, कोरोना वायरस की दहशत पहले दिन से साफ साफ देखी गई है. बड़े प्रोडक्शन हाउस के साथ काम कर रहे पी आर ओ अपना काम कर रहे हैं और अपने क्लाइंट की वाहवाही वाली प्रेस रिलीज भेजते रहते हैं. मिडिल क्लास के पी आर ओ भी पिछले चालीस दिनों में चार पांच बार हरकत में आये हैं और छुटभैया पी आर ओ नदारद हैं. हालांकि, मुम्बई में संक्रमित पत्रकारों की संख्या सर्वाधिक है लेकिन उसमें फिल्म उद्योग से जुड़े पत्रकार नहीं हैं. पी आर ओ भी दुबके हुए हैं. प्राइवेट सेक्टर के किसी पी आर ओ ने किसी मीडिया कर्मी का शायद ही हालचाल पूछा हो.
किसी भी पीआरओ की जांच में कोरोना पॉज़िटिव रिपोर्ट आने से कोरोना की लंबी चेन बनने का खतरा बढ़ता है. और अगर ऐसा हुआ तो, निश्चित ही यह प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती साबित होने जैसा है. क्योंकि कार्यालय मे आने वाले सभी अधिकारी और कर्मचारी पहली मुलाक़ात पी आर ओ से ही करते है. बॉलीवुड में पी आर ओ की परिभाषा थोड़ी सी अलग है. यहाँ जन सम्पर्क कम प्रचार प्रसार अधिक से अधिक करना पड़ता है. इसमें उन्हें मीडिया कर्मियों से सहयोग लेना पड़ता है. कोई भी इवेन्ट या शो हो बॉलीवुड में सेवारत मीडिया कर्मियों से अधिक फ्रीलांसर पी आर ओ द्वारा जुटाई भीड़ का हिस्सा होते हैं. लेकिन किसी पी आर ओ ने संकट के समय किसी स्वतंत्र मीडिया कर्मी की खबर नहीं ली. वह पहले अपना पेट भरेंगे, किसी को न कुछ मदद दिलाई है, न दिलाएंगे.
कोरोना का कोई मजहब नहीं, कोई भाषा नहीं. अमीर – गरीब सभी प्रभावित हैं. इंसान की भूख भी ऐसी ही है. किन्तु बॉलीवुड के लोगों में सारे भेदभाव मौजूद हैं. यहां पर न तो मीडिया कर्मियों का कोई संगठन है और न ही पी आर ओ का. इस लिए इन लोगों को राहत धनराशि या राशन सामग्री कुछ भी नहीं मिला. कुछ चापलूस लोग बेशक अपवाद हो सकते हैं. भला हो उन दो-चार मीडिया कर्मियों का, जो सक्षम है, समर्थ हैं और इस समय कम से कम एक दर्जन स्वतंत्र मीडिया कर्मियों को सहारा दिये हुए हैं. रहने-खाने का उनके लिए पूरी व्यवस्था कर रखी है.
राष्ट्रीय, प्रादेशिक और क्षेत्रीय स्तर पर पत्रकारों के कई संगठन है. कहना अनुचित न होगा कि, सबकी अपनी ढपली अपना राग है. जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत को चरितार्थ करते हुए कुछ लोग ही अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं. सरकारी गैर सरकारी सेक्टर के पी आर ओ का कोई संगठन नहीं है. बॉलीवुड में कुछ अलग हटकर भला कैसे हो सकता है. यहाँ पर मीडिया कर्मियों की कई यूनियन संज्ञान में आई परंतु सब नाम की हैं. स्वतंत्र मीडिया कर्मियों का कोई माई बाप नहीं होता, फिर उनकी खोज खबर कौन लेगा?
आज की पीढी को शायद ही पता हो कि, आज से तकरीबन पचीस – छब्बीस साल पहले पी आर ओ की एक एसोसिएशन भी गठित हुई थी किन्तु वह पूरी तरह से सक्रिय कभी रही ही नहीं. उस समय के नामचीन फिल्म प्रचारक गोपाल पांडेय, गज़ा अरुण, आर आर पाठक, अजीत घोष, आसिफ मर्चेंट, राजू कारिया आदि दर्जनों पी आर ओ इससे जुड़े थे और जूहू स्थित जूहू होटल में एक मीटिंग भी हुई थी. एकाध मीटिंग के बाद सबका जोश ठंडा हो गया और इस संगठन का आज कोई नाम लेने वाला नहीं है. यद्यपि बहुत से लोग आज भी जिंदा हैं और उन्होंने कभी संगठन को सक्रिय करने के लिये कोई पहल नहीं की. शायद सभी स्वतंत्र रूप से शेख अपना देख फार्मूले का अनुसरण करने में लगे रहे हैं. फिल्म उद्योग की अम्ब्रेला यूनियन जब 32 यूनियन के लोगों की मदद करा रही है. अगर मीडिया कर्मियों व पी आर ओ की कोई यूनियन इससे जुडी होती तो, शायद इधर भी उनकी नजरें इनायत हो जाती.
आज बॉलीवुड में पी आर ओ शिप की परिभाषा और कलाकारों व फिल्मकारों की सोंच बहुत बदल गयी है. जिसके पास अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, वरूण धवन, टाईगर श्राफ जैसी शख्सियत हैं, वही बड़ा पी आर ओ है और उसी के पास बड़े बजट वाली फिल्में हैं. उनके पास ही पैसा है. स्माल बजट मूवी मेकर्स भी उन्हीं के पीछे भागते हैं. बॉलीवुड के थ्री टाॅप पी आर ओ पराग देसाई (यूनिवर्सल कम्युनिकेशंस), शिल्पा हाण्डा (स्पाइस) और नीलोफर कुरेशी (हाइप) हैं. इसके बाद रोहिणी अय्यर (रेनड्राॅप), हेमा उपाध्याय (1एच), हिमांशु झुनझुनवाला (द्वापर प्रमोटर्स), अश्विनी शुक्ला (अल्टायर मीडिया), पारुल गोसाईं, मांडवी शर्मा, पारुल चावला, नीलोफर झावेरी, शिफा शेख जैसे तमाम लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं. इसके अलावा मराठी, गुजराती और भोजपुरी सिनेमा के पी आर ओ भी बहुत सारे हैं.
हिन्दी फिल्मों से खाने कमाने वाले लोग आरम्भिक दौर से हिन्दी भाषियों की उपेक्षा करते रहे हैं. ऐसे माहौल में हिन्दी पत्र कर्मियों की क्या बिसात? फिर उसमें स्वतंत्र मीडिया कर्मियों पर कोई ध्यान क्यों देगा? बॉलीवुड के लोगों ने देश की, प्रदेश की और अपने फिल्म उद्योग की खुलकर सहायता सहयोग किया है. इसमें कोई संदेह नहीं है लेकिन बिचौलियों की मेहरबानी से जरूरतमंदो की हेल्प नहीं हो पाई है. बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें हैं और किसी भी हिन्दी सिनेमा के पी आर ओ ने फ्रीलांसर मीडिया की मदद के लिए अलग से अपने क्लाइंट को शायद ही बोला हो. क्योंकि वो सीधे पब्लिकेशन्स और चैनलों को लाभ पहुंचाते हैं. कुछ भोजपुरी वालों ने अंधा बांटे रेवड़ी सिर्फ अपने को दे वाली तर्ज पर भौकाल अवश्य बनाया है. पी आर ओ राम चन्द्र यादव की कृपा दृष्टि सिर्फ अपने बहुत ही खास एक सौ लोगों पर हुई. उसमें एक-दो मीडिया वाले हैं. भोजपुरी के ही पी आर ओ उदय भगत ने भी ढोंग रचा और राशन सामग्री तो किसी को दिलवाई नहीं. जबकि पता चला है कि, यह सहायता अभिनेता व सांसद रवि किशन और अभिनेता दिनेश लाल यादव निरहुआ की तरफ से थी.
अब भोजपुरी के एक और पी आर ओ मुम्बई के एक हिन्दी दैनिक में कार्यरत पत्रकार शशिकान्त सिंह ने फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉयज के प्रेसिडेंट श्री बी. एन. तिवारी से बातचीत करके जरूरतमंद फ़िल्म पत्रकारों को जरूरी खाद्य सामग्री या आर्थिक सहायता दिलाने की पहल की है. किसी को मिले तो मानवता के नाम बहुत बड़ा योगदान होगा. किसी को भी कुछ मिलने की खबर अभी तक नहीं मिली है. फेडरेशन के अलावा शशिकान्त जी चाहें तो भोजपुरी के अभिनेता व सांसद मनोज तिवारी के प्रचारक की हैसियत से उनसे कहकर हिन्दी भोजपुरी की सेवा में लगे स्वतंत्र मीडिया कर्मियों की सहायता करा सकते हैं. हाल फिलहाल मैं भी चुप रहूँगा।
– शामी एम् इरफ़ान (वनअप रिलेशंस, मुम्बई)
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