छोटी नदियों के पुनर्जीवन के लिए संत और समुदाय आगे आए

सतीश चौरसिया उमरियापान । क्षेत्र में बढ़ते जल संकट को देखते हुए छोटी नदियों के पुनर्जीवन के लिए संतों एवं स्थानीय समुदाय ने पहल तेज कर दी है । भारत लाल नामदेव ने कहा कि जल के बिना जीवन संभव नहीं है और वर्ष 2050 तक जल की मांग में करीब 50 प्रतिशत वृद्धि होने की संभावना है । ऐसे में जल संरक्षण और वर्षाजल संचयन को जन-आंदोलन बनाना आवश्यक है ।
उन्होंने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में जल स्रोतों के संरक्षण, स्वच्छता और संवर्धन के लिए सामाजिक सहभागिता जरूरी है । जल संरक्षण की शुरुआत घर, खेत और गांव स्तर से करनी होगी, तभी बढ़ती जल आवश्यकता को पूरा किया जा सकेगा ।
प्रधानमंत्री द्वारा ‘मन की बात’ में भी नदियों के महत्व पर जोर देते हुए ‘विश्व नदी दिवस’ की उपयोगिता बताई गई है । हमारे लिए नदियां केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदायिनी माताएं हैं ।
नामदेव ने बताया कि देश के अधिकांश गांव आज भी भूजल पर निर्भर हैं, जबकि कई स्थानों पर दो-तीन दिन में एक बार ही पेयजल मिल पा रहा है । ऐसे में छोटे-बड़े तालाबों और नदियों का पुनर्जीवन अत्यंत आवश्यक है ।
उन्होंने बताया कि नर्मदा नदी की सहायक नदियां सूखने से उसका प्रवाह भी प्रभावित हो रहा है । इसी को ध्यान में रखते हुए हिरण नदी की सहायक 23 किलोमीटर लंबी दतला नदी के पुनर्जीवन का कार्य पिछले 5 वर्षों से सामुदायिक सहयोग से किया जा रहा है ।
इस अभियान के तहत नदी की सफाई, गाद निकालना, बोरी बंधान, बोल्डर बंड, कंटूर ट्रेंच एवं चेकडैम निर्माण जैसे कार्य किए जा रहे हैं । महिलाओं की भागीदारी से रेत और पानी के अनियंत्रित दोहन पर नियंत्रण भी संभव हुआ है ।
उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों को इन तकनीकों का प्रशिक्षण देकर सक्षम बनाना जरूरी है, ताकि वे स्वयं जल संरक्षण कार्यों में भागीदारी निभा सकें ।
भारत लाल नामदेव ने अपील की कि जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाते हुए प्रत्येक व्यक्ति वर्षा की हर बूंद का संचयन करे और जल के उपयोग में अनुशासन अपनाए, तभी जल संकट का स्थायी समाधान संभव है ।



